सोमवार, 4 सितंबर 2017

ओडीएफ पर मीडिया ब्रीफिंग एवं परिचर्चा



31 अगस्त 2017 को सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट (सीएसइ) के बैनर तले पटना के चाणक्या होटल में मीडिया ब्रीफिंग एवं परिचर्चा का आयोजन किया गया, जिसमें कई प्रदेशों के पत्रकारों एवं जनसंगठनों ने हिस्सा लिया. यह कार्यक्रम ओडीएफ पर आधारित था. इस कार्यक्रम को सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण, डाउन टू अर्थ के प्रबंध संपादक समेत बिहार सरकार के वरीय अधिकारी भी शामिल हुए.

बुधवार, 24 मई 2017

हिंदी उपन्यासों में ग्रामीण जनजीवन का चित्रण


- संतोष सारंग

उत्तर आधुनिकता का लबादा ओढ़े आज का आम आदमी नगरीय तौर-तरीके अपनाने को आकुल है। ग्राम्य जीवन में भी शहरीपन समा चुका है। ठेठ देहाती जीवन मूल्यों पर चोट करती अपसंस्कृति का दर्शन खेत-खलिहानों व पगडंडियों तक में हो जाता है। शहरीकरण, औद्योगीकरण, उदारीकरण के कारण ग्रामीण जनजीवन में तेजी से बदलाव हो रहे हैं। टूटते-बिगड़ते रिश्तों की डोर, सामाजिक सरोकारों से विमुख होकर स्व तक सीमित हो जाना, सहजीवन की वृत्तियों को भुला देना, यह क्या है? प्रगतिशील समाज का द्योतक या समाज का विघटन। समाज में तेजी से हो रहे परिवर्तन प्रगतिवादियों के लिए शुभ हो सकता है, लेकिन एक मजबूत सामाजिक परंपरा के लिए कमजोर करनेवाली प्रक्रिया है। आज का गांव नये रूप में आकार ले रहा है। आधुनिकता की खुली हवा में जवान होती आज की पीढ़ी के खुले विचारों के कारण गांव की आबो-हवा भी बदल रही है। नये विचारों के कारण नयी जीवन पद्धतियां अपनायी जा रही हैं। इसे आप विघटन कह लें अथवा सहज सामाजिक बदलाव। कथा साहित्य इस परिवर्तन को महसूस कर रहा है और इसे अपनी तरह से व्याख्यायित भी करने में पीछे नहीं है। ग्रामीण यथार्थ को साहित्य की अन्य विधाओं ने भी वर्ण्य विषय बनाया है, लेकिन उपन्यास ने ग्रामीण संवेदनाओं को, गांव की माटी में रहकर दुख-दर्द व संत्रास भोगनेवाले दलितों की दयनीय स्थिति को, किसानों की त्रासदी को पूरी ईमानदारी से हूबहू परोसकर महाकाव्यात्मक रूप धारण कर लिया है। प्रेमचन्दोत्तर युगीन कथा साहित्य ने खुद को ऐयारी-तिलिस्म, जासूसी व मनोरंजक छवि से खुद को बाहर निकालकर बदलते गांव की छटपटाहट को महसूस कर उसकी कथा-व्यथा को जीवंत तरीके से चित्रित किया है।     
हिन्दी उपन्यासों में ग्राम्य जीवन का वृहत् चित्रण सर्वप्रथम प्रेमचंद के उपन्यासों में दिखाई देता है। प्रेमचंद ने उपन्यासों में वैसे तो समाज के विभिन्न वर्गों का चित्रण किया है, लेकिन सबसे अधिक श्रमशील रहनेवाले किसानों पर लिखा है; जिसकी आबादी करीब 85 फीसदी है। प्रेमचंद के साहित्य संसार में प्रविष्ट करने का मतलब है भारतवर्ष के गांवों को सच्चे रूप में देखना। उपन्यास सम्राट का साहित्य ग्राम्य चेतना से ओतप्रोत है। प्रेमचंद का अंतिम उपन्यास ‘गोदान’ महाकाव्य का स्वर गूंजित करते हुए इसलिए कालजयी कृति बन सका, क्योंकि उन्होंने भारत की आत्मा में प्रेवश कर अपनी कलम चलायी।

गोदान (1936) के प्रकाशन से दस साल पहले शिवपूजन सहाय ‘देहाती दुनिया’ लिख चुके थे। यह उपन्यास भोजपुर अंचल के ग्राम्य जनजीवन के अनेक प्रसंगों का संकलन है, जो तत्कालीन गांव को यथार्थ रूप में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करता है। गांव की बोली-बानी, भोजपुरी संस्कृति, आंचलिक मुहावरों-कहावतों व लोकगीतों के कारण इस उपन्यास को आंचलिक उपन्यास की संज्ञा दी गयी। 1934 में जयशंकर प्रसाद ने ‘तितली‘ में ग्राम्य जीवन के चित्र व जटिल समस्याओं का अंकन किया। इस उपन्यास के केंद्र में धामपुर गांव है, जिसकी कथा को आगे बढ़ाता है मुख्य पात्र तितली (बंजो), मधुबन (मधुआ), बाबा रामनाथ, राजकुमारी, इंद्रदेव, शैला आदि। ‘‘किसानों-मजदूरों पर होनेवाले अत्याचारों, तहसीलदारों-महंतों के हथकंडों, कलकत्ता महानगरी के जुआडी-जेबकतरों के कारनामों तथा निम्न वर्ग की दयनीय स्थिति, वेश्याओं की धनलोलुपता, विधवा राजो की अतृप्त कामभावना आदि का तितली में यथार्थ अंकन किया गया है।’’1   
         
प्रेमचंद के बाद फणीश्वरनाथ रेणु दूसरे बड़े उपन्यासकार हैं, जिन्होंने गांव को केंद्र में रखकर साहित्य साधना की। ग्राम्य चेतना से पूरित आंचलिक उपन्यास का उद्भव स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी उपन्यास जगत की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही है। आजादी के सात साल बाद 1954 में ‘मैला आंचल’ के प्रकाशन के साथ ही ‘आंचलिकता’ ने अपना स्वतंत्र अर्थ ग्रहण करते हुए हिन्दी साहित्य संसार में अपनी पैठ बना ली। ग्रामीण जीवन पर स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले भी बहुत कुछ लिखा गया, लेकिन ग्राम्य चेतना को आंचलिक शब्द में पिरोने का काम रेणु ही कर सके। ‘‘इतना तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि अंचल को और उसकी कथा-व्यथा को संपूर्णता में उकेरने वाला यह हिन्दी का पहला उपन्यास है और ‘गोदान’ की परंपरा में हिन्दी का अगला। रेणु के उपन्यासों की शुरुआत वहां से होती है, जहां से प्रेमचंद के उपन्यासों का अंत होता है अर्थात् जब टूटती सामंती व्यवस्था का स्थान नया पूंजीवाद लेने लगता है। गोदान का मुख्य पात्र है तत्कालीन भारतीय जीवन और वह उसी प्रकार समष्टिमूलक उपन्यास है जिस प्रकार टॉल्सटाय का ‘वार एंड पीस’, शोलोकोव का ‘क्वाइट फ्लोज द डोन’ तथा अमरीकी उपन्यासकारों सिन्क्लेयर लीविस और जॉन स्टाइनवेक की रचनाएं। फणीश्वरनाथ रेणु ने भी अपनी इस कृति में व्यष्टि को नहीं समष्टि को प्रधानता दी है; यहां व्यक्ति गौण, प्रासंगिक ही है। इसकी कहानी व्यक्ति की नहीं, पूरे गांव की कहानी है। वह अंचल की जिन्दगी सामने रखता है।’’2 

उपन्यास सम्राट प्रेमचंद व आंचलिक कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु के बाद ग्राम्य संवेदनाओं को गहराई से पकड़नेवाले कथाकारों में अररिया जिले के नरपतगंज गांव में किसान  परिवार में 1 जनवरी 1945 को जन्मे रामधारी सिंह दिवाकर का नाम सबसे ऊपर आता है। वे ग्राम्य चेतना के कुशल चितेरे कहे जा सकते हैं। रेणु के बाद गांव-अंचल पर उपन्यास लेखन कर्म के दूसरे बड़े सिद्धहस्त शिल्पी माने जाते हैं। उनके लेखन व चिंतन में गांव की माटी की खुशबू पोर-पोर में समाहित है। दिवाकरजी पर रेणु का प्रभाव साफ-साफ दृष्टिगोचर होता दिखता है, तो इसका पुख्ता कारण भी है। कोसी अंचल के जिस इलाके में रेणुजी का लेखन व जीवन पल्लवित-पुष्पित हुआ, उसी इलाके में दिवाकरजी का भी बचपन बीता, जवानी के दिन बीते और लिखना शुरू किया। रेणु का सानिध्य मिला, तो उनके लेखक मन पर गांव की माटी में साहित्य साधना के बीज अंकुरने लगे, जो आगे चलकर उनके लेखन का आधार बीज बनकर साहित्य जगत में छा गया।       

सुपरिचित कथा-शिल्पी रामधारी सिंह दिवाकर ग्रामीण जनजीवन के सशक्त कथाकार हैं। उनके सभी उपन्यास ‘क्या घर क्या परदेश’, ‘काली सूबह का सूरज’, ‘पंचमी तत्पुरुष’, ‘आग पानी आकाश’, ‘टूटते दायरे’, ‘अकाल संध्या’ एवं ‘दाखिल खारिज’ ग्रामीण जनजीवन के दस्तावेज हैं। दिवाकर अपनी पहली ही औपन्यासिक कृति ‘क्या घर क्या परदेश’ में गांव की आर्थिक व सामाजिक विसंगतियों को उभारने में सफल दिखते हैं। ‘‘आज की बदली हुई परिस्थिति में गांव की स्थिति यह है कि अपने ही खेत में अपने ही हाथ से खेती करनेवाला व्यक्ति हेयदृष्टि से देखा जाता है। दूसरी ओर ऐन-केन-प्रकारेण पैसा बटोरने वाले भ्रष्ट चरित्र समाज के लिए आदर्श बन गये हैं।’’3  ‘अकाल संध्या’ उपन्यास की कथा पूर्णिया जिले के दो गांवों मरकसवा व बड़का गांव को केंद्र में रखकर बुनी गयी है। यह उपन्यास जमींदारों, सवर्णों व बबुआन टोलों के पराभव एवं दलित चेतना के निरंतर हो रहे उभार की कहानी कहता है। ‘‘शूद्रों के उदय की यह कैसी काली आंधी चली है? इस काली आंधी ने परंपरा से चली आ रही सवर्ण सत्ता के चमकते सूरज को शाम होने से पहले ही ढंक लिया। बाबू रणविजय सिंह की जमीन खरीद रहा है गांव का खवास झोली मंडर। नौकर-चाकर अब मिलते नहीं हैं। सब भाग रहे हैं-दिल्ली, पंजाब। बाबू-बबुआनों की जमीन खरीद रहे हैं गांव के राड़-सोलकन।’’4 

प्रेमचंदोत्तर युगीन उपन्यासकारों ने गांव को आधार बनाकर दर्जनों बेहतरीन रचनाएं लिखी हैं, उनमें बाबा नागार्जुन का खास स्थान है। इनके सभी उपन्यासों की कथाभूमि मिथिला के गांव हैं। रतिनाथ की चाची, बलचनमा, नई पौध, बाबा बटेसरनाथ, दुखमोचन, वरुण के बेटे में नागार्जुन ने ग्रामीण जीवन की सामाजिक विषमता, किसानों की यातनापूर्ण स्थिति, गरीबी, वर्ग व्यवस्था को उजागर किया है। बलचनमा निम्नवर्गीय किसान का पुत्र है, जो बड़ा होकर किसान जीवन की पीड़ा, त्रासदियों व अभावों को झेलता हुआ जमींदारों के अमानवीय अत्याचार को झेलता रहता है। इसी तरह नई पौध में सौरठ मेले से जुड़ी सड़ी-गली प्रथा, स्वार्थवृत्ति और पुरानी पीढ़ी की शोषक वासना का नंगा चित्र उद्घाटित करता है। इसमें दिखाया गया है कि कैसे नई पौध के लोग पुरातनपंथी सोच को नकारने को आंदोलित हो उठते हैं। 

जीवनभर रोजी-रोटी के लिए खेतों में पसीने बहाते किसानों, अभावग्रस्त ग्रामीणों की तबाही और बढ़ जाती है जब बाढ़ कहर बनकर टूटती है। बाढ़ की विभीषिका झेलनेवालों की त्रासद कथा को भी उपन्यास में स्वर मिली है। जगदीशचंद्र माथुर का ‘धरती धन न अपना’, रामदरश मिश्र का ‘टूटता हुआ जल’ विवेकी राय का ‘सोना माटी’, रामदरश मिश्र का ‘पानी के प्राचीर’ आदि उपन्यासों में हर साल बाढ़ का कहर झेलते गांवों के लोगों की अंतहीन पीड़ा की दास्तां है। इन उपन्यासों में लेखक ने श्वेत पक्ष को भी उद्घाटित किया है। बाढ़ आती है तो सिर्फ धन-जन ही बहाकर नहीं ले जाती है। वह आपसी वैमनस्य को भी बहा ले जाती है। ‘‘सोना माटी उपन्यास में हर तरफ फैले हुए बाढ़ के पानी के बावजूद रामपुर, मेहपुर, चटाई टोला, बीरपुर जैसे सबके सब गांव एक-दूसरे के निकट आते हैं और सामाजिकता का पूरा निर्वहन करते हैं। बाढ़ का पानी मानों इन गांवों को, गांवों के मैले मन को जोड़ने का सूत्र हो।‘‘5 

शिव प्रसाद सिंह ने ‘अलग-अलग वैतरणी’ में गर्मी-सर्दी की परवाह किये बिना सालों भर मेहनत करनेवाले भारतीय कृषकों में व्याप्त निराशाजनक स्थितियों को रूपायित किया गया है। ‘बबूल’ उपन्यास में बाढ़नपुर गांव में व्याप्त बेकारी की समस्या को चित्रित किया गया है। काम की तलाश में अधिकतर मजदूर दूसरे प्रांतों में पलायन कर जाते हैं। ‘अपनी अपनी कंदील’ में हिमांशु श्रीवास्तव ने माली परिवार की सामाजिक व आर्थिक दशा का अनुशीलन किया है। गांव के गरीबों को सूदखोर उसकी जमीन-जायदाद तक हड़प लेते हैं और उसे जीवनभर दर-दर की ठोकरें खाने को विवश कर देते हैं, यही पीड़ा इस उपन्यास में उभरकर आता है।                                                      
रामदरश मिश्र का ‘सूखता हुआ तालाब’ की चेनइया अपने विजिड़ित जीवन को लेकर देव प्रकाश से कहती हैं। ‘‘बाबा, गांव सचमुच रहने लायक नहीं है, मैं गांव से भाग रही हूं। गांव ने मुझे बेस्सा बनाकर छोड़ दिया, अब जान लेने पर उतारू है।’’6 यहां सूखते हुए तालाब के जरिये कथाकार ग्रामीण जीवन से मानवीय संवेदनाओं के लोप होने की बात उकेरता है। तालाब के सूखने का मतलब है गांव में जीनेवाले लोगों की संवेदनाओं का सूखना। ग्रामीण जीवन में तालाब का एक अपना महत्व है। यह जीवन व परंपरा से जुड़ी है। तालाब को पवित्र मानकर गांव के लोग इसके तट पर धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। आधुनिकता ने तालाब की समृद्ध परंपरा के स्रोत को ही सूखा दिया है। 

वृंदावनलाल वर्मा का ‘लगन’, अमृतलाल नागर का ‘महाकाल’, उग्रजी का ‘जीजीजी’, गोविंदबल्लभ पंत का ‘जूनिया’, भैरव प्रसाद गुप्त का ‘गंगा मैया’, राही मासूम रजा का ‘आधा गांव’, श्रीलाल शुक्ल का ‘राग दरबारी’, शिवकरण सिंह का ‘अस गांव पस गांव’, मधुकांत का ‘गांव की ओर’, एकांत श्रीवास्तव का ‘पानी भीतर फूल’, मार्कण्डेय का ‘अग्निबीज’ आदि उपन्यासों में भी ग्रामीण संवेदनाएं खुलकर उभरी हैं। सियारामशरण गुप्त, उदयशंकर भट्ट समेत कई अन्य कथाकारों ने भी उपन्यासों के माध्यम से गांव का कच्चा चिट्ठा खोलकर रख दिया है। 

वैसे तो, प्रेमचंद से लेकर विवेकी राय तक ने टूटते-बिखड़ते भारतीय गांव के सत्य से पाठकों को साक्षात्कार कराया है, लेकिन बदलते हुए गांव को बारीकी से पकड़ने में रामधारी सिंह दिवाकर ही सफल हो पाये हैं। समय की मार ने जमींदारों को अपनी जमीन बेचने पर मजबूर किया, तो उधर सदियों से सताये गये दलित वर्ग के लोग उनकी प्लॉट खरीद रहा है। पंचायती राज व्यवस्था लागू होने के बाद सड़ी-गली राजनीति का अड्डा बने गांवों में दम तोड़ते मूल्यों की भयानक चीख व्याप्त हो गयी है। मानवीय संबंधों के बीच से रागात्मकता खत्म हो रही है। पिछले कुछ दशकों में दलितों-पिछड़ों के बीच एक सम्पन्न वर्ग पैदा हुआ है। इस वर्ग की अपनी विशेषताएं-विद्रुपताएं हैं। गांवों की इन जटिलताओं व विडंबनाओं को दिवाकर जैसे उपन्यास लेखक ही पकड़ पाये हैं।          
           
संदर्भ :  
1. गोपाल राय, हिन्दी उपन्यास का इतिहास, पृष्ठ 151
2. डॉ शान्तिस्वरूप गुप्त, हिन्दी उपन्यास : महाकाव्य के स्वर, पृष्ठ 83
3. ग्रामीण जीवन का समाजशास्त्र, संपादक : जीतेंद्र वर्मा, पृ. 126
4. रामधारी सिंह दिवाकर, अकाल संध्या, पृ 71, 72
5. देवगुड़ि हुसेनवली, प्रेमचन्दोत्तर हिन्दी उपन्यासों में ग्राम जीवन, पृ. 68
6. डॉ रामदरश मिश्र, सूखता हुआ तालाब, पृ. 102










आवारा पूंजी के इशारे पर नाचता मीडिया

- संतोष सारंग

देश के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक विकास में मीडिया की महती भूमिका होती है। समाज को जागरूक करना, नैतिक मूल्यों को स्थापित करना, भ्रष्टाचार पर प्रहार करना, आम पाठकों की चेतना को झकझोर कर जनमत का निर्माण करना, निष्पक्ष व निर्भीक रहकर सच को उद्घाटित करना पत्रकारिता के दायित्व हैं। मीडिया जनसंचार का सबसे सशक्त माध्यम होता है। इसका असर देश की राजनीति, समाज के विकास पर व्यापक रूप से पड़ता है। मीडिया की जिम्मेवारी है कि वह लोकजीवन की व्यथा एवं उसकी त्रासदी की सही तसवीर पेश कर आम आदमी की आवाज सरकार तक पहुंचाएं। लेकिन क्या वर्तमान दौर में ऐसा हो पा रहा है। इसका जवाब हां और ना दोनों में दिया जा सकता है। कई मोर्चों पर मीडिया का स्याह पक्ष और घनघोर दिखने लगता है, तो कई बार मजबूती व ईमानदारी के साथ अपनी भूमिका निभाता प्रतीत होता है। मीडिया अपने ऊपर लगे धब्बे को धोने में अन्ना आंदोलन के समय कामयाब हुआ था। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ी गयी इस लड़ाई के दौरानं मीडिया की भूमिका जनपक्षधरता वाली रही। लेकिन आवारा पूंजी उसे आम-अवाम के साथ खड़े होने ही नहीं देती है।            ं               
मीडिया मतलब - लोकतंत्र का चैकीदार, बेजुबानों की आवाज, चौथा स्तम्भ, अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम, निडर व निष्पक्ष आदि-आदि। वर्तमान संदर्भ में ये सारे शब्द अब अपनी चमक खो रहे हैं। जिस दौर से आज की पत्रकारिता गुजर रही है, वह मिशनवाली पत्रकारिता को नकारता ही नहीं, धिक्कारता भी है। गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, बाबूराव विष्णु पराड़कर, प्रभाष जोशी की पत्रकारिता निरंकुश सत्ता से टकराती थी, न कि उसकी चिरौरी करती थी और तलबे चाटती थी। जब से मीडिया ने इंडस्ट्री का रूप धारण किया है, मीडिया के मायने ही बदल गये। सारे मानक, मूल्य ध्वस्त हो गये। बाजार पर टिकी अर्थव्यवस्था व प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हो रहे नित्य नये-नये प्रयोग के चलते मीडिया जनोन्मुखी नहीं, बाजार उन्मुखी होकर रह गया है। बाजार ने उसे घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है। आज के मीडिया से व्यापारिक लाभ-हानि की उम्मीद तो की जा सकती है, लेकिन जनसरोकार वाली पत्रकारिता की नहीं। ‘‘आज मीडिया का उद्देश्य लाभ कमाना है। इसमें खबरों से ज्यादा विज्ञापन उत्पाद हैं। मीडिया उच्च वर्ग के पक्ष में सहमति निर्मित करने का सबसे कारगर औजार बन गया है। नाॅम चाॅमस्की के अनुसार, ‘सहमति निर्माण करने और जनमन का नियंत्रण करनेवाला औजार है। ’ 19वीं सदी में ही एक फ्रेंच उपन्यासकार ने व्यवसाय बन चुकी पत्रकारिता के बारे में कहा था कि दरअसल वह ‘मानसिक वेश्यालय’ होती है, जिसमें पत्र मालिक ठेकेदार होते हैं और पत्रकार दलाल। आज मीडिया का लगभग यही हाल हो रहा है। इसे निकट से जाननेवाले मानते हैं कि यह नरक बन गया है-फैशन व ग्लैमर से चमचमाता एक नरक।’’1 तेजी से बदल रही दुनिया के साथ कदमताल करते जनसंचार माध्यमों के सामने आज कई गंभीर चुनौतियां आ खड़ी हुई हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में आज के समय में मीडिया की भूमिका को तलाशने की जरूरत है।  

वैश्विक गांव बन चुकी दुनिया में एक-एक आदमी उपभोक्ता बन चुका है। 90 के दशक के बाद भूमंडलीकरण की ऐसी हवा बही कि आम आदमी की निहायत निजी जिंदगी व दैहिक-मानसिक वृत्ति भी बाजार के हवाले चली गयी। बड़ी चालाकी से बाजार के धुरंधरों ने पहले अपने व्यापार के विस्तार के लिए जमीन तैयार की, उसके बाद हमारी भावनाओं व संवेदनाओं को भी उत्पाद बनाकर बाजार में उतार दिया। बाजार जितना बड़ा होगा, विज्ञापन की संभवानाएं भी उतनी ही बड़ी होंगी। ‘‘पत्रकारिता वास्तव में विज्ञापन के व्यवसाय का दूसरा नाम है। टाइम्स आॅफ इंडिया के विनीत जैन ने अपने एक इंटरव्यू मेें ये कहा था कि वे न्यूज के व्यवसाय में नहीं है, बल्कि वे विज्ञापन का व्यवसाय करते हैं।’’2 विज्ञापन और उससे ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की प्रवृति ने लोकतंत्र के लिए पत्रकारिता करनेवाले संस्थानों को पत्रकारिता के लिए कारोबार करनेवाले संस्थानों में परिवर्तित कर दिया है। कल तक पेट्रोल व मोबाइल बेचनेवाली कंपनियां आज अखबार निकाल रही हैं, समाचार चैनल चला रही हैं। कुल मिलाकर प्रिंट व इलेक्ट्राॅनिक मीडिया पर काॅरपोरेट घरानों का कब्जा हो गया है। बाजार अपना होगा, वस्तु (प्रोडक्ट्स) भी अपनी और विज्ञापन भी अपने ही समूह के अखबार व चैनल पर होगा। पूंजी का यह मायाजाल मीडिया को सोचने पर मजबूर कर रहा है कि आज उसकी भूमिका क्या रह गयी है। असत्य के धरातल पर सत्य का उद्घाटन करना आज बड़ा कठिन कार्य हो गया है। बाजार की इस चालाकी पर गौर करें तो सारा माजरा समझ में आ जाता है कि कैसे न्यूज व व्यूज को उत्पाद बनाकर आकर्षक ढंग से पेश करने का सारा खेल चल रहा है। इस पूरे खेल के पीछे सत्ता का भी हाथ है और पूरी मशीनरी का भी। बाजार व सरकार के इस नये गठजोड़ ने सच्ची पत्रकारिता करनेवालों व इसके इथिक्स को बचाये रखने में लगे लोगों को भी चिंतित कर रखा है।

प्रबंधन व विज्ञापन के दबाव में अपने पत्रकारीय धर्म का ईमानदारीपूर्वक निर्वहन न कर पाने की छटपटाहट के बीच पत्रकारिता अपना तेवर खोती जा रही है। अखबारनवीस की कलम की धार कुंद होती जा रही है। अब खासकर हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में योग्य, कुशल, प्रतिभाशाली व ईमानदार पत्रकारों की कमी खलने लगी है। न्यूज रूम व रिपोर्टिंग में ऐसे लोग आ रहे हैं, जो संपादक के कृपापात्र होते हैं या पैरवीपुत्र। न्यूज रूम का माहौल ऐसा बन गया है, जहां बौद्धिक विमर्श के लिए कोई जगह नहीं है। घासलेटी बातें, घटिया राजनीति न्यूज रूम की भाषा व पहचान बन गयी है। वो जमाना गया, जब एक पढ़ा-लिखा व जागरूक पाठक ‘संपादक के नाम पत्र’ लिख-लिख कर लेखक-पत्रकार बन जाता था। न्यूज रूम में भी इस स्तम्भ में प्रकाशित गंभीर पत्र पर चर्चा होती थी और उसका असर सरकारी विभागों पर भी पड़ता था। जब से अखबार उत्पाद वस्तु बना, तब से ‘खबरों का असर’ भी घट गया है। खबरों का असर दिखाने के लिए सरकारी विभाग तक को मैनेज किया जाने लगा है। खबरों का खौफ हाकिम-हुक्मरानों में नहीं रहा। मीडिया का मुंह बंद करना है तो विज्ञापन दे दो, नहीं तो पैसे से मीडिया मैनेज कर लो।  

मीडिया मालिकों को भी अब संपादक नहीं, मैनेजर चाहिए, जो मैनेजमेंट की भाषा बोले, पत्रकारिता न झाड़े। वर्तमान समय में संपादक पद की गरिमा की बात करना बेमानी है। जब से हिन्दी अखबारों के छोटे-छोटे शहरों में लोकल एडिशन निकलना शुरू हुआ है, तब से मीडिया के क्षेत्र में काफी गिरावट आयी है। जितने संस्करण, उतने संपादक चाहिए। बुजुर्ग संपादकों का जमाना गया। अनुभवहीन, अधकचरे ज्ञान वाले युवा संपादकों की मांग बढ़ी है। ‘‘बाजारवाद की जकड़न में फंसे प्रिंट मीडिया के संसार में आज ऐसे संपादकों का अकाल पैदा हो गया है जो बाबूराव विष्णु पराड़कर की तरह नये समय के उपयुक्त कुछ नये शब्द गढ़ सकें। उच्च पौद्यौगिकी के नये स्वरों के अनुकूल शब्दों को समायोजित कर सकें। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की तरह उपभोक्तावादी संस्कृति के विकृत प्रभाव से हिंदी भाषा के संस्कार को बचा सकें, विकृत और भ्रष्ट हो चुकी भाषा के परिमार्जन का बीड़ा उठा सकें।’’3 भाषा संस्कार व शुद्धता की दृष्टि से हिंदी पत्रकारिता को कंगाल कहा जा सकता है। हिंदी पट्टी से निकलनेवाले अखबारों के डाक एडिशन को भाषायी प्रदूषण फैलाने के कारण ‘कचरा संस्करण’ कहा जा सकता है। 300 शब्दों के एक खबर में 50-100 त्रुटियां मिल जायेंगी। लुगदी अखबारों को पाठक झेल रहे हैं।  
आज संकट सिर्फ मीडिया की विश्वसनीयता व साख का ही नहीं, बल्कि स्मार्टफोन के जमाने में गंभीर पाठकों का भी हो चला है। आज के सुधि पाठकों की मुट्ठी में दुनियाभर के अखबार व चैनल सिमटकर आ गये हैं। शहरी ही क्यों, गांव के नवधनाढ्य भी स्टेटस सिंबल के लिए दो-तीन अखबार अपने दरवाजे तक मंगवाता है, लेकिन 4जी-5जी की स्पीड से भाग रही खबरों के पीछे उनका दिमाग भागता रहता है। उसे फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सअप, ब्लाॅगिंग, यू-ट्यूब से फुर्सत कहां है कि 16-18 पेज के न्यूजपेपर कोे पलटे। पाठक ही क्यों, पत्रकार भी तो सिर्फ लिखने के आदी हो गये हैैं, पढ़ने के नहीं। महीनों तक एक ही तरह की गलतियां छपती रही हैं और पाठक उसे झेलता रहता है। इतना ही नहीं, कई और तरह के संकट झेल रहे प्रिंट व इलेक्ट्राॅनिक मीडिया पूंजी के प्रवाह में ऐसा बहा कि उसकी भूमिका ही बदल गयी। निष्पक्ष पत्रकारिता व साख के बल पर सरकार तक को हिला देनेवाला मीडिया पेड न्यूज छापने लगा। जनमत निर्माण की महती भूमिका छोड़कर सरकार के पक्ष में अथवा खिलाफ में हवा बनाने में रम गया। इसका असर सबसे पहले उसकी साख पर पड़ी।  

हालांकि, 2009 में देश के छह बड़े संपादकों प्रभाष जोशी, कुलदीप नैयर, अजीत भट्टाचार्य, जार्ज वर्गीज, हरिवंश व अच्युतानंद मिश्र ने पेड न्यूज के खिलाफ देशभर में अभियान चला कर वर्णसंकर पत्रकारिता पर आघात किया। 6 फरवरी 1992 को सुप्रसिद्ध पत्रकार सुरेंद्र प्रताप सिंह ने रांची में प्रभात खबर द्वारा आयोजित ‘भारत किधर व्याख्यानमाला’ में चिंता जाहिर की थी, ‘‘हिंदी पत्रकारिता में आज सबसे बड़ी चुनौती पत्र-पत्रिकाओं और अखबार के साख का है। पिछले दो सालों से साख का सवाल ज्यादा विकराल रूप में हमारे सामने आ खड़ा हुआ है। मंडल आयोग और मंदिर-मसजिद के मुद्दों पर तो साख को और धक्का लगा है। आज हिंदी पत्रकारिता जहां पहुंची है, वहां से वह ऐसे सवाल छोड़ गयी है, जिसका सही समाधान नहीं किया गया, तो वह पतन के गर्त में चली जायेगी। अभी तो लोग पत्रकारों से पुलिसवालों की तरह डरने लगे हैं। पता नहीं क्यों यह स्थिति बनी है कि लोग पत्रकारों, पत्रकारिता और छपे हुए शब्दों से डरने लगे हैं। इन्हें अप्रभावी माना जाने लगा है, जबकि कुछ वर्ष पहले तक लोग अखबार में छपे शब्दों को ब्रह्म वाक्य मानते थे और पत्रकारों को सम्मान की नजर से देखते थे। आज यह आत्ममंथन करने की जरूरत है कि कहीं इसके लिए पत्रकार स्वयं तो जिम्मेवार नहीं हैं?’’4   

इसमें दो राय नहीं कि जब मीडिया कमजोर होगा, तो लोकतंत्र को संक्रमण से नहीं बचाया जा सकता है। अब समय आ गया है कि पत्रकारिता की कमजोर होती जड़ों को मजबूत किया जाये। मीडिया को खुद अपनी भूमिका तय करनी होगी, नहीं तो बाजार उसे ग्रास बनाकर चबा जायेगा। इन दिनों पत्रकारिता के शब्दकोष में कई ऐसे शब्द गढ़े गये हैं, जो उसकी भूमिका को प्रभावी बना सकते हैं। जनमीडिया, सोशल मीडिया, कम्युनिटी मीडिया, मोबाइल मीडिया के दौर में इस क्षेत्र में नयी संभावनाओं का दौर खुला है। देश-दुनिया में कई सफल प्रयोग हुए हैं, जो भटके काॅरपोरेट मीडिया को चुनौती दे सकते हैं। कम संसाधन व पूंजी में यूपी के बुंदेलखंड समेत कई जिलों से महिलाओं द्वारा निकाले जानेवाला अखबार ‘खबर लहरिया’ इसका बड़ा उदाहरण है। देश ही नहीं विदेशों में भी वैकल्पिक मीडिया के कई सफल नाम हैं।  ‘ओह माई न्यूज’ दक्षिण कोरिया का एक आॅनलाइन न्यूजपेपर है, जिसका पंचलाइन ही है-हर नागरिक पत्रकार है। इसमें 80 फीसदी कंटेंट आमलोग उपलब्ध कराते हैं और केवल 20 फीसदी पेशेवर पत्रकार। न किसी काॅरपोरेट घरानों का दबाव और न सरकार का। ओह माई न्यूज करीब 17 साल से नागरिक पत्रकारिता के जरिये अपने दायित्वबोध से भटके मीडिया के समक्ष एक नजीर पेश करता आ रहा है।

बहरहाल, वर्तमान परिपे्रक्ष्य में मीडिया को तमाम दबावों, प्रलोभनों के बीच से ही कोई न कोई रास्ता खोज निकालना होगा, जो उसे पुरानी भूमिका में ला खड़ा करे, क्योंकि बाजार से मुक्ति अभी मिलनी नहीं है। जिस दिन मीडिया अपनी पत्रकारीय धर्म को छोड़कर पूरी तरह बाजारू बन गया, उसी दिन उसका क्षय अवश्यंभावी हो जायेगा। आज डर इसी बात का है और इस मुश्किल भरे दौड़ से उबार ले जाने की चुनौतियां भी बरकरार हैं।                                 
संदर्भ:
1. गवेषणा, पृ. 104-105, अंक-105/2015
2. जन मीडिया, पृ. 24, अंक-फरवरी 2017
3. गगनांचल, पृ. 95, अंक-4-5, जुलाई-अक्टूबर, 2015
4. प्रभात खबर: प्रयोग की कहानी, पृ. 185 
  



मंगलवार, 28 जून 2016

फुलदेव गैरों से निभाते हैं खून के रिश्ते

- संतोष सारंग
  • खून देकर बचाते हैं जिंदगी, 34 बार कर चुके हैं रक्तदान
फूलदेव पटेल
जब सांस आस छोड़ने लगती है, तब अपने भी मुंह मोड़ लेते हैं. वेंटीलेटर पर जिंदगी आ जाती है, तो कई बार खून के रिश्ते का रंग बदल जाता है. लोगों को खून की जरूरत होती है, तो कोई आगे नहीं आता. लेकिन, फूलदेव खून देकर लोगों की जिंदगी बचाने को तैयार रहते हैं. मुजफ्फरपुर जिले के सुदूर पश्चिमी दियारा इलाके के गांव चांदकेवारी के फूलदेव ने अब तक दर्जनों लोगों की जिंदगी बचायी है. 1996 से अब तक वे 34 बार रक्तदान कर चुके हैं. गुजरात, दिल्ली, पटना, मोतिहारी व मुजफ्फरपुर में निजी नौकरी करते हुए फूलदेव ने बीमार लोगों को रक्तदान किया. 20 साल से वे दूसरों की जिंदगी बचाने के इस व्यक्तिगत मुहिम में लगे हैं. फूलदेव से प्रेरणा लेकर करीब नौ लोग रक्तदान कर चुके हैं. फूलदेव इस मुहिम में लगे हैं कि समाज के अधिक से अधिक लोग रक्तदान करने को आगे आयें. वे घूम-घूम कर लोगों को रक्तदान के फायदों के बारे में बताते हैं. इन दिनों वे रक्तदान करनेवाले लोगों का एक नेटवर्क बनाने में लगे हैं, ताकि लोगों को जरूरत पड़ने पर खून के लिए भटकना न पड़े.

डॉ वीरेंद्रनाथ मिश्र बिहार विवि में हिंदी के प्रोफेसर हैं. उनकी पत्नी लंबे समय से बीमार है. फूलदेव उन्हें अब तक दो बार खून दे चुके हैं.  डॉ मिश्र बताते हैं कि यह उनके व्यक्तित्व का शौर्य, हृदय का सौंदर्य और आचरण का औदार्य है कि दोनों किडनी फेल होने के कारण डायलीसिस पर पड़ी जानलेवा बीमारी कैंसर से संघर्ष करती हुई मेरी पत्नी रंभा मिश्रा को फुलदेवजी ने रक्त रूप में जीवन की सांसें दान स्वरूप दी. उस फुलदेवजी ने मंगल का व्रत रखा था. उपवास पर थे. यह व्यक्तित्व हमारे समाज के लिए प्रेरणादायी है. रक्तदान जैसे महायज्ञ को सफलीभूत करनेवाले नायक के रूप में मेरे लिए वे आदरणीय हैं.

फूलदेव कहते हैं कि जिंदगी बचाना ही मेरा मकसद है. सबसे पहले 12 दिसंबर, 1996 को सूरत में एक मजदूर को खून देकर जान बचायी थी. वह सड़क हादसे में गंभीर रूप से जख्मी हो गया था. डॉक्टर ने तत्काल खून की व्यवस्था करने को कहा, क्योंकि उसकी जिंदगी खतरे में थी. पहली बार मुझे ब्लड डोनेट करने में डर लग रहा था. लेकिन, मेरे सामने एक जिंदगी को बचाने का सवाल था. मुझे सुकून हुआ, जब वह बच गया. उसी घटना ने मेरी जिंदगी के मकसद को बदल दिया. जब भी कोई पुकार दे, मैं अपना काम छोड़ कर दौड़ा-दौड़ा खून देने चला जाता हूं.

बुधवार, 23 दिसंबर 2015

काला पानी की सजा भुगत रहे कई गांव


  • संतोष सारंग
नदी है, पानी है। पानी से घिरे खेत-खलिहान। किंतु सदा नीरा नहीं, है जहरीला। 13 बरस से अभिशप्त इलाका। आम जिंदगी, उर्वर धरती, हरियाली पर काली साया, मनुषमारा का। ‘मनुषमारा’ एक नदी है, जिसे लोग कहते रहे हैं जीवनदायिनी। ये ही आज छिन रही हैं लोगों की खुशियां, खेतों की उर्वरता, फसलों की हरियाली। देने को दे रही सिर्फ गंभीर बीमारीजनित काला पानी, जहरीला जल। ताउम्र के लिए बच्चे-बूढ़े हो रहे विकलांग, इलाका उजाड़। यही तो कहानी है रून्नीसैदपुर व बेलसंड के कई गांवों की।
सीतामढ़ी के रून्नीसैदपुर व बेलसंड के आधा दर्जन गांवों के लिए मानो ‘मनुषमारा’ नदी अभिशाप बन गयी है। उत्तर बिहार के इस सुदूर इलाके के लोग 15 साल से काला पानी की सजा भुगत रहे हैं। खड़का पंचायत के भादा
इस इलाके का करीब 20,000 एकड़ भूभाग दूषित पानी में डूबा है। स्थिति इतनी भयावह हो गयी है कि यहां के लोग अपनी माटी, अपना गांव छोड़कर पलायन करने को मजबूर हैं। पिछले दिनों तिरहुत प्रक्षेत्र के आयुक्त अतुल कुमार ने रून्नीसैदपुर के दो गांवों भादा टोल व हरिदोपट्टी का दौराकर वहां की अभिशप्त जिंदगी को निकट से देखकर द्रवित हुए। लौटकर उन्होंने अपनी वेबसाइट पर पूरी रिपोर्ट लिखी थी। इन गांवों में अधिकारियों की टीम जाकर शिविर लगाया और बुनियादी जरूरतों को पूरी करने की पहल शुरू की, लेकिन उनके तबादले के बाद सबकुछ स्थिर हो गया। रैन विशुनी पंचायत के मुखिया प्रेमशंकर सिंह कहते हैं कि यहां के किसान मर रहे हैं। जलजमाव के कारण फसल नहीं हो रहा है। जो जमीन सूखी है, वहां जंगल उग गये हैं। बनसुगर से लेकर कई जंगली जानवरों से लोग परेशान हैं। जमीन भी नहीं बिक रही है। जमीन से कुछ नहीं मिला, फिर भी मालगुजारी देनी पड़ती है। लोग निराश हो चुके हैं। लेबर तो पलायन कर गये, लेकिन किसान कहां जाये।
यह समस्या 1997 की बाढ़ के बाद तब शुरू हुआ, जब मधकौल गांव के पास बागमती नदी का बायां तटबंध टूटने के कारण मनुषमारा नदी, जो बागमती से मिलती थी, उसका मुहाना ब्लाॅक हो गया और उसका एक किनारा बेलसंड कोठी के पास टूट गया। इसके बाद इसका पानी रून्नीसैदपुर से लेकर बेलसंड से धरहरवा गांव तक फैल गया। उधर, रीगा चीनी मिल से निकलने वाला कचरा इस जलधारा के जरिये करीब दो दर्जन गांवों तक पहुंच गया और समस्या को और भयावह बना दिया।   
प्रेमशंकर सिंह बताते हैं कि बागमती पर रिंग बांध बनाने से यह समस्या उत्पन्न हुई। इसका समाधान जलनिकासी ही है। इसके लिए नहर खोदकर इस पानी को निकाला जाये, लेकिन यह संभव होता नहीं दिख रहा है। काला पानी की जलनिकासी के लिए अनवरत संघर्ष चलते रहे हैं। एक दशक पूर्व ही राज्य के जल संसाधन विभाग ने जलनिकासी के लिए एक विस्तृत योजना बनानी शुरू की, जो आज तक अमल में नहीं आयी। अभी हाल में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने पर्यावरण मानकों के उल्लंघन के लिए रीगा चीनी मिल को नोटिस जारी किया।
 टोला गांव समेत हरिदोपट्टी, अथरी, रैन विशुनी, बगाही रामनगर पंचायतों की स्थिति बनी भयावह है। हजारों एकड़ जमीन पर काला व जहरीला पानी पसरा हुआ है। इसके चलते लोगों की खेती गयी। आजीविका का साधन छीन गया है और मुफ्त में मिल रहीं गंभीर बीमारियां। पशु-पक्षी, कीट-पतंग मर रहे हैं। जलनिकासी के लिए प्रखंड व जिला मुख्यालयों पर ग्रामीणों ने आंदोलन चलाया, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ। अधिकारी बेफ्रिक हैं, और लोग परेशान। काला पानी का असर खेतों से लेकर घरों तक हो रहा है। सबसे अधिक प्रभावित भादा टोला है, जो रसायन घुले पानी से घिरा है। इस गांव के लगभग दो दर्जन लोग विकलांग हो चुके हैं। लालबाबू राम, रामसकल राम, सुखदेव राम, कुलदीप राम व राजदेव मंडल पुरी तरह निःशक्त हो गये हैं। चलने-फिरने में असमर्थ हैं। सगरी देवी, सुमित्रा देवी, सगरी देवी, कुसमी देवी समेत दो दर्जन लोग विकलांगता के शिकार हो चुके हैं। भादाडीह टोला के ही चार लोग हसनी देवी, बलम राम, सिंकिंद्र राम व विनय राम कुष्ठ रोग से ग्रसित हैं। बलम राम बताते हैं कि हम अभिशाप ढो रहे हैं। हमें सिर्फ आश्वासन मिला है। कोई मदद करने नहीं आया है। ‘जल ही जीवन है, लेकिन इनके लिए पानी मौत बन चुकी है’ जुमला बन गया है।      

बीज को बर्बादी का कारण समझें या व्यवस्था को

- संतोष सारंग
  • खेती के ढर्रे बदले, किसानों की तकदीर नहीं
वक्त के बदलते मिजाज के साथ खेती के तौर-तरीके भी बदल गये। सामा, कउनी, मडुआ, कोदो, जौ, जौ बुट्टा, जौ खेसरा, जौ केराई, जवार, बाजरा के पौधों से लहलहाने वाले खेतों में अब औषधिये पौधे, मेंथा, गेंदा, गुलाब की खेती हो रही है। परंपरागत फसलों को छोड़कर वैज्ञानिक व नकदी खेती का चलन बढ़ा है। महंगी होती खेती, सिकुड़ते खेत-खलिहान व शहरीकरण ने खेती-किसानी के ढर्रे को बदलकर कई समस्याएं पैदा की हैं। एक आम आदमी के स्वास्थ्य से लेकर खेतों की सेहत तक प्रभावित हो रही हैं। इन वजहों से गरमा व मोटा कहे जानेवाले धान के कई प्रभेद विलुप्त हो रहे हैं। बीजों के संरक्षण का चलन हाइब्रिड बीजों के कारण बीते दिनों की बात हो गयी। किसान की तकदीर कुख्यात बीज कंपनियों, दुकानदारों व कृषि विभाग के कारनामों पर टिकी है। नयी पीढ़ी के युवा किसान से सामा-कउनी का नाम पूछिये, तो शायद वे नहीं बता पायेंगे। किंतु मोनसेंटो का नाम जरूर बता देंगे।  

अधिक उपज के लालच में किसान ने परंपरागत खेती को छोड़कर वैज्ञानिक की राह पकड़ी। इनका अच्छा फलाफल मिला, लेकिन नुकसान भी कम नहीं उठाना पड़ रहा। फसलों की कई प्रजातियां बीजों के संरक्षण के अभाव में खत्म हो गयीं। किसानों की तमाम परेशानियों के बीच समय-समय पर खबरें आती हैं कि मक्के-गेहूं की बाली में दाना नहीं आया, तो कभी गेहूं के बीजों का अंकुरण नहीं होने की खबरें आती हैं। दिसंबर में मुजफ्फरपुर के कई प्रखंडों के किसान जिला कृषि कार्यालय में शिकायत लेकर पहुंचे कि उनलोगों ने टीडीसी (उŸाराखंड सीड्स एवं तराई डेवलपमेंट काॅरपोरेशन) कंपनी के गेहूं बीज की बुआई किया था, जो खेतों में नमी रहने के बाद भी अंकुरित नहीं हुआ। गेहूं की तीन किस्मों एचडी 2967, बीड ब्लू 17 एवं पीबीडब्ल्यू 373 के फेल होने से सैकड़ों किसान हताश हैं। मुजफ्फरपुर जिला कृषि विभाग ने कार्रवाई करते हुए बीजों की लैब में जांच करायी। उपनिदेशक शस्य बीज विश्लेषण (बिहार) ने जांच में तीनों किस्मों के बीज को अमानक पाया। इसके बाद कृषि विभाग ने टीडीसी कंपनी के स्थानीय विपणन अधिकारी, वितरक व विक्रेताओं पर प्राथमिकी दर्ज करायी। जिला कृषि पदाधिकारी ललन कुमार चैधरी कहते हैं कि किसान ठगे गये हैं। अमानक बीज की श्रेणी में और भी बीज हैं। यह राज्य सरकार के बीज विश्लेषण लैब की रिपोर्ट है।

किसानों की बर्बादी की कथा-व्यथा देशभर में मौजूद हैं। इनमें सरकार से लेकर बीज कंपनियों व कृषि अधिकारियों तक की भूमिका खलनायकी वाली रही है। सरकारी पहल से भी किसानों का भला नहीं हो रहा। ‘बीज ग्राम योजना’ बिहार के किसानों के लिए उम्मीद बनकर आयी थी, लेकिन वह भी दगा दे गयी। यह योजना भी अन्य योजनाओं की तरह फेल हो गयी। बिहार राज्य बीज निगम सर्टिफाइड बीज का प्रमाणपत्र देने के अलावा कुछ नहीं कर सका। योजना के तहत किसानों ने बीज का उत्पादन किया, लेकिन चूहे का निवाला बन गया। किसानों को न मार्केट मिला और न ही अनुदान राशि मिली। चांदकेवारी बीज ग्राम के किसान भी भुक्तभोगी बने।   

सरैया प्रखंड के बल्ली सरैया के किसान महेश्वर यादव कहते हैं कि विभागीय अधिकारियों की लापरवाही के कारण योजना सफल नहीं हुई। वे कहते हैं कि हाइब्रिड बीज न हमारे पर्यावरण और न खेतों के लिए फायदेमंद है। इससे लाभ बस इतना हुआ है कि उपज थोड़ी बढ़ी है, पर नुकसान भी कम नहीं हुआ है। पहले चीना, कोदो, मडुआ आदि की खेती होती थी। इसकी खेती कम-से-कम पानी में होता था। फर्टिलाइजर की भी बहुत जरूरत नहीं होती थी। ये फसलें सूखा बर्दाश्त करती थीं। परंपरागत धान की खेती भी कम पानी में होती थी। महेश्वर जैसे अन्य किसानों का भी कहना है कि हाइब्रिड इसका विकल्प नहीं बन सकता। इसमें पानी अधिक व फर्टिलाइजर-पेस्टीसाइड्स का अंधाधुंध प्रयोग करना पड़ता है। महंगा बीज बेचकर कंपनियां किसानों का दोहन ही करती हैं। इसलिए आज बीज का संरक्षण जरूरी हो गया है। राज्य सरकार को बीज के संरक्षण व उसकी गुणवŸाा के लिए बीज निगम को सुदृद्ध बनाने की जरूरत है। मडुआ, सामा, कोदो समेत कई परंपरागत प्रभेद के बीज विलुप्त हो गये या होने के कगार पर है। किसानों का कहना है कि परंपरागत बीजों के संरक्षण व विपणन में किसी भी बीज कंपनियों को दिलचस्पी नहीं है, क्योंकि इसमें कमाई कम नजर आती है।     
                       
सीड्स जेनेरेशन व फ्रूटिंग के सवाल पर महकमे के अधिकारी का तर्क कुछ अलग है। किरण किशोर प्रसाद (उपनिदेशक सह बीज विश्लेषण, पटना) का कहना है कि पौधों में बाली नहीं आना या बीज अंकुरित न होना कई कारणों पर निर्भर करता है। सिर्फ बीज कंपनियों पर दोष मढ़ना ठीक नहीं है। किसानों में जागरुकता की कमी, बीज की ढुलाई व रखरखाव, आसपास का तापमान, फील्ड कंडीशन, मौसम, मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी आदि कई कारण हैं बीजों के अंकुरित नहीं होने के। बीज एक कारण हो सकता है। कई बार देखा गया है कि बीज दुकानदार एक ही गोदाम में बीज व खाद की बोरी एवं कीटनाशक रखे होते हैं। ऐसे में उस बीज की गुणवŸाा पर असर पड़ता है। मौसम में बदलाव खेती पर व्यापक असर डाल रहा है। गांवों में यह कहा जाता रहा है कि जब मुंह से भाप निकलने लगे, तो गेहूं की बुआई शुरू कर देना चाहिए। लेकिन कई जगह दिसंबर बीतने पर भी मुंह से भाप नहीं निकला।

विभाग के अधिकारी किसान को सलाह देते हैं कि बुआई से पहले सर्विस नमूना (सैंपल बीज) की जांच सरकारी लैब में एक रुपये टोकन मनी देकर प्रखंड कृषि अधिकारी, कृषि सलाहकार व समन्वयक के माध्यम से करा लें। बिहार के पटना, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, सहरसा, भागलपुर, कैमूर समेत सात जिलों में सात लैब हैं, जहां बीज के मानक की जांच कराने की सुविधा उपलब्ध है। अन्य जिलों में भी लैब हैं, लेकिन कर्मियों की कमी के कारण चालू नहीं हैं। किसान खुद भी बुआई से पहले बीज की डेमो जांच कर सकते हैं। थोड़े-से बालू व मिट्टी में बीज गिराकर देख लें कि कितना प्रतिशत अंकुरण हुआ। तभी बुआई करें, तो सही उपज होगी। बीज विश्लेषण श्री प्रसाद बताते हैं कि प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के साथ-साथ प्रोडक्शन को भी बढ़ाना जरूरी है। बदलते मौसम को देखते हुए अन्न संकट की आशंका बढ़ गयी है। अनावृष्टि की स्थिति में वैकल्पिक खेती ही सहारा बनेगी। सरकार अभी से सचेत है। राज्य सरकार मडुआ समेत अन्य वैकल्पिक खेती को प्रोत्साहन दे रही है, ताकि जल संकट की घड़ी में खेती संभव हो।   
            
पटना यूनिवर्सिटी के जंतुविज्ञान विभागाध्यक्ष व डाॅल्फिन मैन के नाम से चर्चित डाॅ आरके सिन्हा कहते हैं कि धरती से वनस्पति की 17 हजार प्रजातियां खत्म हो चुकी हैं। हम नहीं चेते, तो मनुष्य का अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा। वे बताते हैं कि साठी धान में ल्यूसियम नामक तत्व पाया जाता है, जो मनुष्य के रक्त में ऑक्सीजन घोलने की क्षमता बढ़ाता है। यह धान पानी में रहते 60 दिनों में तैयार हो जाता है, लेकिन इसकी उपज कम होती है। इस वजह से किसान शंकर प्रजाति के धान की खेती करते हैं। ऐसे में साठी धान का प्रभेद खत्म हो रहा है, जबकि शंकर धान में साठी का गुण नहीं होने के कारण मनुष्य के शरीर में ऑक्सीजन ढोने की क्षमता घटती जा रही है, जो बीमारियों को जन्म देते हैं.

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

पेरिस सम्मेलन में गूंजी मुजफ्फरपुर के लाल की आवाज

                                                                                                                                            - संतोष सारंग

पेरिस में आयोजित जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में बोलते चंद्रभूषण.
मुजफ्फरपुर के एक छोटे से गांव चैनपुर (मड़वन) में शय़ाम किशोर सिंह के घर में जन्मे चंद्र भूषण अपने बलबूते फ्रांस तक पहुंच गया. 30 नवंबर से 11 दिसंबर तक पेरिस में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में सीएसइ के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे चंद्रभूषण का बचपन गांव में बीता. शुरुआती शिक्षा मुजफ्फरपुर में संत जेवियर्स एकेडमी, जूरन छपरा में हुई. चंद्र भूषण ने सिविल इंजीनियरिंग में बीटेक व इन्वायरमेंटल प्लानिंग में एमटेक करने के बाद गुजरात में पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करना शुरू किया. इसी क्रम में अहमदाबाद में देश के प्रसिद्ध पर्यावरणविद् एवं सेंटर फॉर साइंस एंड इन्वायरमेंट (सीएसइ) के संस्थापक अनिल अग्रवाल के संपर्क में आये. इसके बाद दिल्ली पहुंचे और सीएसइ से जुड़कर धरती बचाने के प्रयास में जुट गये. फिलवक्त सीएसइ में बतौर डिप्टी डायरेक्टर जनरल चंद्रभूषण अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रहे हैं.
पर्यावरण व विकास पर 10 से अधिक पुस्तकें
चंद्रभूषण ने पर्यावरण व विकास पर आधारित अंगरेजी में 10 से अधिक शोधपरक किताबें लिखी हैं, जिनमें फूड एज टॉक्सिन, फेसिंग द सन, गोइंग रिमोट, हिट ऑन पावर, रीच लैंड, पूअर पीपल : इज सस्टेनेबल माइनिंग पॉसिब्ल आदि प्रमुख हैं. वे सीएसई की पत्रिका 'डाउन टू अथ' के कंसल्टिंग एडिटर भी हैं. कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं. भारत सरकार के अलावा कई देशों की सरकारों के साथ जलवायु परिवर्तन के मुद्दों पर मिलकर काम कर रहे हैं. चंद्रभूषण नेशनल एक्रेडिएशन बोर्ड फॉर ट्रेनिंग एंड एडुकेशन एव ब्यूरो ऑफ इंडिया स्टैंडर्ड के सदस्य रह चुके हैं. भारत की पंचवर्षीय योजना की ड्राफ्टिंग कमेटी का भी हिस्सा रहे.
दुनिया से असमानता घटे 
एक दिसंबर को इटली के पूर्व प्रधानमंत्री मासिमो डीएलेमा के साथ पैनल डिस्कशन में चंद्रभूषण ने साफ कहा कि फेयर क्लाइमेट चेंज डील के लिए यहां हमें इस बात पर विचार करनी होगी कि कैसे दुनिया से असमानता घटे. वे कहते हैं कि हमारी आजीविका पर्यावरण पर निर्भर है. जल प्रदूषित होने पर मत्स्यपालन पर असर पड़ेगा. मिट्टी की सेहत खराब होगी, तो फसलों की उपज कम होगी. जंगल कटेगा, तो गरीबों को खाना पकाने के लिए लकड़ी नहीं मिलेगी. हमें यह समझना होगा कि पर्यावरण का संरक्षण कितना जरूरी है.
काम से आया बदलाव
चद्रभूषण बताते हैं कि खदान पर किये गये मेरे काम के कारण सभी माइनिंग डिस्ट्रिक्ट में डिस्ट्रिक्ट मिनेरल फाउंडेशन (डीएमएफ) का गठन किया गया. इसके तहत खदान की कमाई का 10 प्रतिशत हिस्सा गरीबों की सहायता के लिए डीएमएफ में जमा हो रहा है. इसी तरह पेय व खाद्य पदार्थो जैसे-शॉफ्ट ड्रिंक, चिकेन, मधु आदि में मौजूद कीटनाशी व प्रतिजैविक तत्वों पर मेरे काम के बाद खाद्य सुरक्षा के मानकों में बदलाव किया गया.
कांटी थर्मल को ले चिंता
पिछले एक साल से कोयला से बिजली पैदा करनेवाले प्लांट के पर्यावरण मानक में सुधार लाने के लिए उर्जा मंत्रालय व पावर प्लांट के खिलाफ लड़ाई जारी है. अभी हाल में मुजफ्फरपुर से लौटे चंद्रभूषण कहते हैं कि हम कांटी थर्मल पावर को लेकर भी चिंतित हैं. कहते हैं कि कांटी की हवा काफी प्रदूषित हो गयी है. प्रदूषण कम करनेवाली तकनीक उपलब्ध है, लेकिन पावर प्लांट इसके इस्तेमाल को ले इच्छुक नहीं है. हमें इसपर भी काम करना है.
http://epaper.prabhatkhabar.com/657055/MUZAFFARPUR-City/City#page/8/1

बुधवार, 30 सितंबर 2015

किसानों को बदनसीबी देकर लौट रहा माॅनसून


  •  संतोष सारंग
कमजोर माॅनसून ने भारतीय किसानों को एक बार फिर संकट में डाल दिया है। कम बारिश के कारण खरीफ फसलें झुलस रही हैं। बिहार के किसान धान के हरे-हरे पौधे काटकर मवेशी को खिला रहे हैं। देश के अन्य हिस्सों के किसान भी मौसम की असहनीय मार झेलते हुए हिम्मत हार रहे हैं। सौराष्ट्र से लेकर बुंदेलखड तक के किसान आत्मघाती कदम उठाने को विवश हैं। देश के अन्नदाताओं के हिस्से में दुख, चिंता, संत्रास की काली छाया के अलावा है ही क्या? उम्मीदों की फसल काटने के लिए बैंक व महाजन से कर्ज लेते हैं और बदले में मिलती है नाउम्मीदी की मौत। अभिशप्त जिंदगी और फसल व अनमोल जीवन के मुआवजे का लाॅलीपाॅप। 
भारतीय किसानों की त्रासदी समझने के लिए ये तस्वीरें काफी हैं। तेलंगाना के मेडक जिले के रयावरम गांव का एक किसान आत्महत्या कर लेता है। दुनिया छोड़ने से पहले वह अपने सात वर्ष के बेटे से कहता है, ‘बेटे, कभी किसान मत बनना’। बुंदेलखंड के महोबा जिले के ननौरा गांव के किसान रामकिशन पटेल को उम्मीद थी कि इस वर्ष अच्छी फसल होगी, लेकिन मौसम ने दगा दिया। कर्ज से दबे रामकिशन इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर सके। देश के किसानों की बदनसीबी का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। एक अनुमान के मुताबिक, बीते दो दशकों में देश के 1.25 लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या कर ली। किसानों की त्रासदी इन आंकड़ों से समझा जा सकता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस वर्ष के प्रथम छह माह में महाराष्ट्र में 1300 किसानों ने सुसाइड किया है, जबकि बीते वर्ष 1981 किसानों ने आत्महत्या की थी। इससे जाहिर है कि साल-दर-साल किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला बढ़ रहा है। आंकड़ों पर विश्वास करें तो पिछले एक साल में किसानों की आत्महत्या की दर में 20 फीसदी की वृद्धि हुई है। 2001 से लेकर 2011 तक देश के लगभग 90 लाख किसानों ने खेती छोड़कर अन्य काम-धंधों पर लग गये।         
माॅनसून का सीजन बीतने को है, फिर भी किसान अंतिम उम्मीदों के साथ आसमान की ओर ललचाई नजरों से छकाते बादलों को देख रहे हैं। एक बार बादल बरस जाये, तो शायद फसल को जीवनदान मिल जाये। लेकिन ऐसा होने की उम्मीद नजर नहीं आ रही। मुजफ्फरपुर के युवा किसान फुलदेव पटेल कहते हैं कि सात कट्ठा धान के खेत में एक बार पंपसेट से पटवन करने में 820 रुपये लगा। 120 रुपये प्रति घंटे के हिसाब से सात कट्ठा धान के खेत को सिंचित करने में छह घंटे लगे। सिंचाई करने की दोबारा हिम्मत नहीं हुई। सात कट्ठे में दो किलो धान भी हो जाये, तो बहुत है। बोआई के समय भी जेब ढीली करनी पड़ी और अब फसल बचाने के लिए करनी पड़ रही है।   
खेती-किसानी व मनीआॅर्डर इकोनाॅमी वाले बिहार में 50 फीसदी से कम बारिश दर्ज की गयी। सितंबर तक बिहार के भोजपुर, अररिया, मुजफ्फरपुर, नालंदा, शिवहर, सीतामढ़ी, गया, गोपालगंज समेत 19 जिलों में 46 फीसदी से कम बारिश हुई। इस कारण खरीफ फसलें चैपट हो रही हैं। गुजरात में भी 66 प्रतिशत ही बारिश हुई। सौराष्ट्र इलाके की स्थिति तो और ही विकट है। अल्पवृष्टि के कारण वहां के बांधों में भी सिंचाई के लिए ज्यादा पानी नहीं बचा है। जामनगर जिले के बांध में सिर्फ पांच फीसदी ही पानी बचा है। जूनागढ़ के बांधों में सिर्फ 13 फीसदी व पोरबंदर जिले के बांधों में सिर्फ 8 फीसदी पानी शेष है। पानी की कमी से कपास व तिलहन फसल अधिक बर्बाद हुई है।
यह लगातार दूसरा साल है, जब माॅनसून कमजोर रहा। भारत के कृषि उत्पादन का माॅनसून से सीधा संबंध है। 2010 में जब बारिश औसत से 2 फीसदी अधिक हुई थी, तब कृषि उत्पादन में 8.6 फीसदी का इजाफा हुआ था। एक साल पूर्व जब बारिश में 21.8 फीसदी की गिरावट दर्ज की गयी थी, तब कृषि उत्पादन में 0.8 फीसदी की गिरावट दर्ज की गयी थी। देश में 2009 जैसे सूखे के हालात बन रहे हैं। इस बात की चेतावनी देते हुए मौसम विभाग ने से कहा है कि अगस्त महीने तक समूचे देश में सामान्य से 12 फीसदी कम बारिश हुई है। माॅनसून पर अलनीनो का साफ असर दिख रहा है। भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, अबतक देश के 40 फीसदी इलाकों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गयी है। दक्षिण भारत के केरल, कर्नाटक व तेलंगाना की स्थिति और भयावह है। इन इलाकों में 26-44 फीसदी तक कम बारिश हुई है। वहीं मध्य महाराष्ट्र व मराठवाड़ा में सामान्य से करीब 50 फीसदी कम बारिश हुई है, जबकि पंजाब व हरियाणा में सामान्य से करीब 35 फीसदी कम बारिश हुई है। बिहार व यूपी के हालात भी बेहद खराब है। इससे किसानों की कमर टूट सकती है।
देश के लगभग 283 जिले सूखे की चपेट में हैं। अल्पवृष्टि ने सबको परेशान कर रखा है। कहने को तो मौसम विभाग, कृषि विशेषज्ञ व सरकार भी देश के इस हालात से ंिचंंितत है। विभागीय अधिकारी का भी रोना है कि कृषि आधारित भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह मौसम बेहद खराब है। चालू वित्तीय वर्ष में कमजोर माॅनसून का कृषि उत्पादन पर असर पड़ना तय है। जिसे देश की 60 फीसदी खेती माॅनसून पर निर्भर है, उसकी सेहत पर कमजोर माॅनसून का असर तो पड़ना ही है।
इस बुरी खबर के बीच केंद्रीय विŸा मं़त्री अरुण जेटली ने देश की जनता को भरोसा दिलाया है कि देश में खाद्यान्न के पर्याप्त भंडार है। अतः देशवासियों को घबराना नहीं चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि हम कीमतें बढ़ने नहीं देंगे और लोगों को उचित दर पर सभी आवश्यक खाद्य सामग्री उपलब्ध करायेंगे। कृषि मंत्री राधामोहन सिंह कहते हैं कि कमजोर माॅनसून से निबटने के लिए सरकार ने आपात योजना बना ली है। उधर कैबिनेट की बैठक में दो महीना पहले ही मौसम का पूर्वानुमान देखते हुए सभी मंत्रियों को अपने-अपने विभाग की तैयारियां तेज करने का निर्देश दिया था। लेकिन प्रधानमंत्री व विŸामंत्री की बातों पर देश की जनता को कितना भरोसा है, यह तो वक्त ही बतायेगा। लिहाजा, सूखे की काली छाया के बीच दहलन व प्याज की आसमान छूती कीमतों ने आमलोगों को शंकालु बना दिया है।   
कमजोर माॅनसून का धान, कपास, दलहन की पैदावार पर असर पड़ेगा। किसान कर्ज तले दबेंगे। खाने-पीने के सामान की कीमतों में इजाफा हो सकता है। महंगाई बढ़ सकती है। सवाल है कि एग्रीकल्चर सेक्टर की इस दीन-हीन अवस्था को ले केंद्र व राज्य सरकारें कितना संवेदनशील है? विश्व बैंक के एक आकलन के मुताबिक, भारत की कुल खेती के मात्र 35 फीसदी हिस्से को सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है। यानी दो-तिहाई खेती माॅनसून के रहमो-करम पर है। सरकारें चाहे तात्कालिक जो भी एक्शन प्लान या आपदा योजना बना लें, खेती व किसानों को संकट से नहीं उबार सकती है। जबतक हमारी निर्भरता माॅनसून पर से कम नहीं होगी, तबतक अच्छे दिन नहीं आयेंगे। आजादी के छह दशक बाद भी मुकम्मल सिंचाई के साधन मुहैया कराने में सरकार पीछे रही। स्टेट बोरिंग का प्रयोग भी असफल रहा। आज भी सुदूर गांवों तक बिजली नहीं पहुंची, ताकि किफायती सिंचाई की व्यवस्था किसान खुद कर सके। अनियोजित विकास के कारण परंपरागत जलस्त्रोत भी नष्ट हो रहे हैं। भ्रष्ट सरकारी तंत्र के कारण नहरें भी खेतों की प्यास बुझाने में नाकाम साबित हो रही हैं। आनेवाले दिनों में जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि संकट और गहराने वाला है। ऐसी विकट स्थिति के बीच अन्नदाता को इन्द्र देवता का कृपापात्र बने रहने को छोड़कर देश के राजनीतिक नेतृत्व ने आजतक क्या किया? इसका जवाब हमारे रहनुमाओं को एक-न-एक दिन देना पड़ेगा। 


शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

Role of Women and Women's Organization

Role of Women

Historical data signified that women have many role in civilisation since ancient time and these roles are changing over the period. In a society, status of people can be assessed by importance of women in that culture. Many factors that rationalise the magnitude of India's ancient culture is the respectable place granted to women. Several research studies have demonstrated that women have raised their position and made a place in different sectors which has led to liberation and to live better life. In ancient culture, women had to suffer from unequal condition, and but as the time passed, females had enhanced their status to get equality to the men (Christina S. Handayani, Ardhian Novianto, 2004). Earlier, women were only allowed for doing domestic activity and their contribution in public was very restricted. It entails that the political sector was only for male communities and the women were concern to the private sector. This notion is the basic understanding of classic feminist theory which wants that women get the equal condition comparing to men (Ann Brooks, 2009). The status of women in India has been subjected to many great changes over the past decades. From equal status with men in ancient times through the low points of the medieval period, to the promotion of equal rights by many reformers, the history of women in India has been exciting. In contemporary India, women have joined high offices. However, women in India generally are still exposed to numerous social issues. According to a global study conducted by Thomson Reuters, India is the "fourth most unsafe country" in the world for women.
According to Christina S. Handayani and Ardhian Novianto (2004), females only work in western countries and their role in Asian countries in public-private is not limited like in western countries. It is established in studies that Women are important in our society. Every woman has her own job or duty in this modern society in which men are still dominant. A woman has to take care of her own personal life and if she is a mother, she has to take care also about her children's life too. Married women have lots of worries and they carry out a more stressful life than married men.
Many studies have indicated that physiologically women are not equal to men and both are also dissimilar psychologically. But there is not much difference between women and men in the normal activities like eating, drinking, working, sleeping, resting and speaking. But women have physical and physiological differences based on their functions like child-bearing and child-rearing. It is well established in theoretical studies that women and men react differently when they groom their children. Both women and men do what they have learnt during their childhood as far as their reactions to various situations in their life.

Women in India

The status of women in India has undergone drastic changes over a Past few millennia. In ancient time, the Indian women were completely devoted to their families. In the Medieval period, known as 'Dark Age', the status of women was declined considerably. They were not allowed to go out, and move with others. They were asked to stay at home and take care of their children. In India, early marriage of a girl was practiced. After Independence women came forward in all the sectors and there is remarkable changes in the status of women in the field of education, Art and Culture. A historical viewpoint to the complexities, India continues to face from time to time since Independence. But the status of women in contemporary India is a sort of inconsistency.

Role of Women in Prehistoric Time

Indus valley civilization: During the period of Indus valley civilization, status of women were fairly good. They were given equal honour along as men in the culture. The adoration of mother goddess demonstrates that they were respected in the form of mother. During Rig Vedic period, woman had superior status and they got more liberty and equality with men. The position of wife was a privileged one in the household and women had enhanced status to that of a man in performing religious rites. In education sphere, both boys and girls were having equal opportunities. After observing Upanayana Samskar, girls were permitted to spend their life in Gurukul. In intellectual and spiritual life they occupied a position as man. Education of girls were considered as an important qualification for marriage.
In Uttar Vedic Period: In this period, freedom of marriage continued and remarriage of widows continued to be allowed. Though dowry system continued but not in the form of today's society. The marriage ceremony was the same as in the previous period. As in the previous period the picture of an ideal family life continued.

The Age of the Upanishads

Age of Sutras and Epics: The Grihya-sutras give comprehensive rules concerning the proper seasons for marriage, qualifications of bride and bridegroom. The bride is at a mature age, over 15 or 16. The elaborate rites indicate that marriage was a holy bond and not a contract. The women held a respectable status in the household. She was permissible to sing, dance and enjoy life. Sati was not generally predominant. Widow Remarriage was permissible under certain circumstances. On the whole the Dharma-sutras take a more humane attitude than the Smritis of a later age. The Apastamba enforces several penalties on a husband who unfairly forsakes his wife. On the other hand, a wife who forsakes her husband has to only perform self-punishment. In case a matured girl was not married at a proper time by her father, she could choose her husband after three years of waiting. The appealing feature of this period is the presence of women teachers, many of whom possessed highest spiritual knowledge. The famous dialogue between Yajnavalkya and his wife Maitreyi and Gargi Vachaknavi indicated how enlightened the women of that age were. According to the Sarvanukramanika, there were as many as 20 women among the authors of the Rig Veda. These stories stand in contrast to the later age when the study of Vedic literature was prohibited to women under the most severe penalty.

In The Age 600 BC to 320 AD

In this period, marriage between the same caste was preferred although inter caste marriages were widespread. Of the eight forms of marriage prescribed by the Dharma-sutras, the Arhsa form of marriage was most popular. The bridegroom was selected by the girl's father. According to Nearchus the Indians "marry without giving or taking dowries but the girls, as soon as they are marriageable, are brought forward by their fathers and exposed in public, to be selected by a person who outclasses in some form of physical exercise". This designated a modified form of Svayamvara. While girls continued to be married around 16, there was a propensity to marry them before they attained puberty. It was perhaps due to the anxiety to maintain their body purity. Lowering of the marriage age affected their education and culture unfavourably. After Extreme emphasis was now laid on the physical chastity of women which dejected widow remarriage, divorce and encouragement of sati.
It was also found that females during this period were active in such public economic activities as wage-labour in state-owned textile factories as well as serving as temple dancers, courtesans, and court attendants. There is less information on lower class women other than some comments on labouring women and the need to give works as spinners to such underprivileged women as widows and "defective girls."
In the beginning of this period, there were well educated women holding an honourable position in society and household. There were lifetime students of sacred texts or those who followed their study till marriage. Buddhist and Jain nuns relinquished the world for the sake of spiritual salvation. Jain texts refer to Jayanti who performed discussions with Mahavira himself and later on became a nun.
In spite of the advancement, there were increasing infirmities. Earlier the girls went through the Upanayana ceremony but now it was only a formality. Manu laid down that marriage was equal to Upanayana while Yajnavalkya took the step of prohibiting Upanayana ceremony for girls. The wife who performed Vedic sacrifices was denied the right to do so. Narada is however, more thoughtful towards women. Greek writers have indicated that sati existed, was in trend in Punjab, possibly confined to the fighter class only. Women courtesans were not looked down by spiritual leaders or kings. Some of them were highly accomplished and in the point of culture, standing resembled the Hetairai of Athens. A famous courtesan Amrapali who lived during the sovereignty of Bimbisara (300 to 273 BC) was a beauty whom Buddha visited.
Chandragupta Maurya, the originator of the dynasty, was apparently assisted by Kautilya, a Brahman prime minister, who composed the Arthasastra, a handbook of state craft which is often compared to Machiavelli's The Prince. This collection documents that women had property rights to the Stridhan, which was the gift made to a woman at the time of her marriage by her parents and subsequently increased by her husband. Stridhan was generally in the form of jewellery, which many cultural groups was a suitable way of carrying extra wealth, but could include certain rights to immovable property. There were eight forms of marriage. They ranged from the most significant, involving the gift of a virgin daughter (Kanyadan) by her father to another male, to marriage by kidnapping while the woman is incapacitated through sleep or intoxication. Marriage was both a secular and sacred institution. Widows had a right of remarry. Although, when they did so, they lost rights to any property inbred from their deceased husbands. In this period, women were allowed to participate in public economic activities as wage-labour in state-owned factories as well as serving as temple dancers, courtesans.

Period of 320 to 750 A D

The Gupta Empire was observed as the classical age of Indian culture because of its legendary and artistic happenings. Some information on roles for leading women comes from the Kama Sutra, a manual about the many ways to acquire pleasure, a legitimate goal for Hindu men in the householder, or second stage, of their lives. Women were allowed to be educated, to give and to receive sexual pleasure, and to be faithful wives. There was an increasing tendency to lower the marriageable age of girls with girls being married before or after puberty. Marriage within the same caste was preferred but forbidden within certain degrees of relationship. Girls of high families had ample opportunities for acquiring ability in higher learning. In Vatsyayana's Kamasutra, instances of princess are mentioned whose intellect was sharpened by knowledge of the Sasatras. The literary evidence of the Gupta age demonstrates that girls of high class also those living in hermitages read works on ancient history & legend. Girls living in royal courts were trained in singing & dancing too.
In the Gupta period, Sati was inscribed by some but strongly criticised by others. It was thought that the custom was not extensively prevalent during this period. Probably due to the foreign invasions and its significances for women, the custom of sati, though confined to the warrior class earlier began to gain pervasive acceptance, be perceived as a great sacrifice. The tendency to regard women as feebler and not of strong moral fibre got stronger during this period although women as mother, sister continued to be highly esteemed. Remarriage of widows though coming into disfavour was not forbidden. The only direction in which the position of women improved was in the arena of proprietary rights. During this period, society began to discourage widow remarriages, there began to arise a class of childless widows who needed money to maintain themselves. Due to a lowering of the age of marriage, girls were not literate as earlier. This degraded the status of women. Brides being too young and they did not have any choice in marriage decisions. Love marriages were a thing of the past. During this period, marriage became a binding union, but it was one sided in favour of the husband. Since women were not as educated as before they did not know how to lead life in right way. The most striking modifications may be the increased recognition in Katyayana of the women's right to property and a noteworthy rule in Atri that allowed women ill-treated by robbers to recuperate her social status. Some women enjoyed political power e.g. Prabhavati-gupta, daughter of Chandra-gupta II who ruled the Vakataka kingdom on behalf of her son, in the 4th century a.d. Available Exisitng literature designated that married women in higher families did not usually appear in public without coverings.

Women in Early medieval Period

In this period as in previous time, women were generally considered mentally sub-standard. Their responsibility was to obey their husband blindly. Women continued to be deprived of the right to study the Vedas. Furthermore, the eligible age for girls to marriage was lowered, thus depriving their opportunities to get higher education. However, from some of the dramatic works of the period, it was found the court ladies and even the queen's maids capable of composing excellent Sanskrit and prakrit verses. Daughters of high administrators, courtesans and concubines were also supposed to be highly skilled in the various arts, including poetry.
If a girl's guardian cannot find her a match before she becomes of marriageable age, then she can choose her partner. While love marriages were known they were honoured after approval of the girl's custodians. Sometimes, girls with the approval of their parents opted for a Svayamvara ceremony. Remarriage was allowed under certain condition when the husband had deserted or died, or adopted the life of a recluse, or was impotent or had become an out caste.
In general, women were mistrusted. They were kept in privacy and their life was governed by the male relation, father, brother, husband, son. However, within the home they were given privileged. If a husband abandoned even a guilty-wife, she was to be given maintenance. With the evolution of property rights in land, the property right of women also increased. In order to preserve the property of a family, women were given the right to inherit the property of their male relations. With some reservation, a widow was permitted to the entire estate of her husband if he died sonless. Daughters also had the right to succeed to the properties of a widow. Thus, the growth of feudal society supported the concept of private property. The practice of sati was made mandatory by few authors, but predestined by others. Purdah was not dominant during this period. Generally, their culture was high

Women in medieval India

Medieval Indian history continued for 500 years. It is principally dominated by Muslim rulers. Muslim appeared in India as a warrior class. Their rule in India is divided into two Eras; The Era of Delhi Sultanate and the Mughal Era. The only women who has power and gained the thrown of Delhi was Razia Sultan. She was not only a wise monarch but also a women of determined courage. She proved herself as the role of model for politically empowered women in India. In Mughal Period, India saw the rise of some renowned Muslim women. Qutluq Nigar Khanm Babar's mother gave wise advice to her son Babar, during his difficult campaign for the recovery of his father's heritage. Another example was Gulbadan Begum, women of excellent poetic talent who wrote Humayun-namah. Nur Jahan and Jahan Ara took an active part in the state affairs. Nurjahan was the greatest Muslim queen of India. She had good persona and military courage. Mumtaj Mahal a princess of an exceptional beauty along with excellent intellectual talents and aesthetic tastes. In India, there was also heroic women. Chandbibi, who appeared on the battlements of the fort of Ahmednagar dressed in male outfit and put heart in the protectors of that town against the influences of Akbar himself; Tara Bai, the Maharata heroine who was the life and soul of Maharata resistance during the last determined attack of Aurangazeb; Mangammal, whose benevolent rule is still a green memory in the South, and Ahalya Bai Holkar, to whose administrative mastermind Sir John Malcolm has paid magnificent honour. The Moghul princesses had vital role in the court life of Agra and Delhi. Jehanara, the partisan of Dara Shikoh, Roshanara, the partisan of Aurangazeb, Zebunnissa, the daughter of Aurangazeb, whose poems have come down to us and others represented the culture of the court. Jija Bai, the mother of Shivaji, was more representative of Indian womanhood than the bejewelled princesses who wrote poetry, played within the walls of their palaces or administered states. In the medieval period, there were drastic changes in the social life of women. Dependence of women on their husbands or other male relatives was a protuberant feature of this period. During this period women were deprived of opportunities of any education, having lost the access to Streedhana or dowry, they virtually became the subjugated class with dreadful results for themselves and the nation. Indian women were politically, socially and economically indolent except for those engaged in farming and weaving. Political demotion includes the barring of women from all important decision- making processes. With the initiation of Muslims in India, the social movement of Indian women was limited. They were banned to attend public functions and were not free to partake as men's equals in religious functions like yajnas, obviously indicating a deprivation of her role as she was kept in isolation. Another social malevolent that existed in society during this period was child marriage. These pre-pubescent marriages harmfully affected the health of the girls. These child brides were deprived of all intellectual, physical and spiritual development. It virtually stabbed the delicate mind of Indian girl child. Her self-image was wavering into shreds by the patriarchal family which repudiated her basic freedom. Indian womanhood was cruelly locked. Likewise, most of the women thought that they have to serve at home. Thus they were influenced by circumstances to accept their subordination and secondary position. Men being providers, women became dependent on them economically, for their survival except for the labour classes, where both men and women contributed in existence farming and other occupations.
Other social evils in this period were female infanticide, sati, child marriages, Purdah system or zenana. The seclusion of women developed during the middle ages, due to the political instability of Northern India, particularly due to various assaults. Muslims who came to India were mainly soldiers and they did not give much importance to Hindu principles like chastity and Pativrata dharma so the seclusion of women was fortified mainly by the Rajputs and the other high castes like Brahmins. Polygamy was the first reason which contributed to the demotion of women. Muslim rulers in India had big aim. Thus women came to be regarded as tools of sensual satisfaction. Even among the Hindus, there was no limit for wives a man could take. Marriage in Islam is a contract. But a Muslim man can have as many as four wives. Thus even religion encouraged, there was the hopeless subservience of women. Islam also made husband the head of the family and insisted that a wife should follow all his commands and should serve him with greatest loyalty, whether he deserved for it or not.
Purdah gained acceptance with the advent of the Muslims. The purdah system existed among Kshatriyas in the period of Dharma Sastras. But the Hindu women veiled only their face or sometimes only covered their heads with sarees or "dupattas." But for Muslims it meant complete covering. Dowry system was also prevalent during this period. It actually meant "Stridhana" which included gifts, ornaments, property, and cash presented to her by her father or her relatives. But in the medieval period, the term had special importance. It meant money or "Dakshina" which was actually presented to the bride groom along with the bride. In Vedic times, it guaranteed security for her. But during the middle-ages, women was not free to use it as it was owned by her husband and his kith and kin. During the middle Ages, the term "Stridhana" acquired huge magnitudes. The Hindus and Muslims favoured this custom of dowry. It could be paid in cash or kind along with the bride. During the Vedic ages, it was given to bride for her security when a crisis occurs. She was free to make use of this "Dhana". But the middle Ages observed a sudden change. The Stridhana received by the groom belonged completely to the in-laws. The bride did not have free access to this wealth, which lawfully belonged to her. Dowry system existed even among the Muslims, especially among the Shias. With time, dowry became a vital part of the marriage ceremony. This in a way contributed to female infanticide, as it became a heavy burden on the poor. The birth of girls became a frightening to the majority of the population. Another negative effect of the dowry system was that there was degradation of the Indian woman. She began to be regarded as transportable and removable property by her husband. Many law intellectuals and upholders of religion in the medieval age stated that it literally induced physical as well as intellectual impairment on women in medieval India.
In the medieval period, widow's condition were more miserable. Inflexibility of caste system deprived of them the right to freedom and social movement. Inhuman treatment was given to the widow. She was forced to lead a life away from sophisticated pleasures. A widow was also isolated from society as well as family. Another pre-requisite for a widow was shaving the head. She was thus shamed mercilessly by modern society. The condition of the Muslim widow was somewhat better owing to the fact that she could marry after a certain gap of time following her husband's death.
According to Jauha, there was the practice of voluntary immolation by wives and daughters of overpowered warriors, in order to avoid capture and resulting molestation by the opponent. The practice was followed by the wives of defeated Rajput rulers, who are known to place a high premium on honour. The medieval society of the time stimulated "Sati" which referred as self-immolation of the widow. It was thought that by burning herself on the fire of her husband, she proves her devotion. Even the child widows were not safe from this grisly ritual. According to Saroj Gulati "because of the continuous wars, there were chances of too many widows young and old, and main issue was how to accommodate them without getting shame to the family or creating problems for society." In this period, Sati was considered as the best course though it was the nastiest crime committed on Indian women as it was inhumane.
Another heinous torture of women was prostitution which became a recognised institution. The Devadasi system which was predominant among the Hindus and the courtesans who ornamented the court of Muslim rulers, dishonoured the status of women in civilisation. Under the Devadasi system, women were the brides of gods. But they were supposed to amuse kings, priests and even members of the high classes. Actually, they were abused by the existing male-dominated society.

Women in the Bhakti Movement

Bhakti movements which succeeded during the medieval age gave rise to a new course of man and women who cared slightly for gender prejudice. The liberal current, which to some extent extended the prospect of women, was the Bhakti movements, the medieval saints' movements. Female poet-saints also played a significant role in the bhakti movement at large. However, many of these women had to fight for acceptance within male dominated movement. Only through demonstrations of their absolute devotion to the Divine, their outstanding poetry, and persistent insistence of their spiritual equality with their contemporaries were these women unwillingly acknowledged and accepted within their ranks. Their struggle shows to the strength of patriarchal values within both society and within religious and social movements attempting to pave the way for more egalitarian access to the Divine.
The imagery of bhakti poetry is chastised in the everyday, familiar language of ordinary people. Women bhaktas wrote of the obstacles of home, family tensions, the absent husband, meaningless household chores, and restrictions of married life, including their status as married women. In many cases, they excluded traditional women's roles and societal norms by leaving husbands and homes altogether, choosing to become wandering bhaktas; in some instances they formed communities with other poet-saints. Their new focus was sheer devotion and worship of their Divine Husbands.
While it is attractive to realise women's participation within the bhakti movement as a rebellion against the patriarchal norms of the time, there is less evidence to support this perspective. Women bhaktas were simply individuals attempting to lead lives of devotion. Staying largely within the patriarchal philosophy that upheld the chaste and dutiful wife as ideal, these women transferred the object of their devotion and their duties as the "lovers" or "wives" to their Divine Lover or Husband. However, that their poetry became an important aspect of the bhakti movement.
Additionally, it would seem that with the movement's northward advancement (15th through 17th centuries), its radical edge as it related to women's inclusion was toughened. Women took part in the movement's earlier development (6th to 13th centuries). It is mainly male bhaktas and saints that are today perceived as the spokespersons for the movement in its later manifestations. The poetry of women bhaktas from this latter time period is normally not revealing of a rejection of societal customs in terms of leaving family and homes in chase of divine love. Instead, some of the later poet-saints stayed within the limits of the household while expounding on their souls' journeys, their perpetual love for the Divine, as well as their never-ending search for fact.

Women in Modern India

Modern India denotes to the era form 1700 A.D. to 1947 A.D. In the back ground of the intellectual disturbance of the 18th and 19th century, there observed a worldwide demand for establishing of independent and democratic nationalist societies which consistently emphasized the fairness of women with men. Women in modern India have been influenced by the programs of modification and upliftment which brought about a fundamental change in their status. With the numerous reform movements and a steady change in the opinion of women in society, there, a radical change in the position of women in modern India was seen. Before the British rule in India, the life of women was rather domineering, and they were subject to a continual process of subjugation and social domination. The women's youth was spent in the preparation of marriage and her whole life was dependent on the male members of her family. Though a few women became educated, got fame and commanded armies but most were deprived of men's opportunities to gain knowledge, property and social position.
Status of women in India during the British period:
If comparing with past records of women status with contemporary life, it can be said that there are important change in the position of women. Numerous studies of the English literature by a section of the Indians which helped them to integrate the western democratic and liberal ideology, an philosophy successively utilized by them to start social and religious reform movements in India. During the British rule, several changes were made in the economic and social structures of Indian society, and some considerable progress was accomplished in removal of inequalities between men and women, in education, employment, social rights. Earlier to this period, the status of women was in gloomy state.
In the British period, women were given opportunities for education. After the Bhakti Movement, the Christian Missionaries took interest in the education of the girls. The Hunter Commission too highlighted on the need for female education in 1882. The Calcutta, Bombay and Madras institutions did not permit the admission of girls till 1875. It was only after 1882 that girls were permitted to go for higher education. Since then, there has been a constant progress in the extent of education among females. Though the number of girls studying at various levels was low, yet there has been a marked increase in the number of female students at every level from 1941 onwards. At the end of the Nineteenth Century, women in India suffered from infirmities like, child-marriage, practice of polygamy, sale of girls for marriage purposes, severe restrictions on widows, non-access to education and restricting oneself to domestic and child-bearing functions. The Indian National Conference started in 1885 by Justice Ranade contained these disabilities.
Renowned social reformer, Raja Ram Mohun Roy, who contributed immensely in getting the Sati system abolished, raised voices against the child-marriage and fought for the right of legacy for women. Ishwar Chandra Vidyasagar propelled a movement for the right of widows to re-marry and also begged for educating women. Maharaja S. Rao, ruler of Baroda State worked for deterrence of child-marriages, Polygamy and getting the rights of education to women, and the right of re-marriage to widows. Other eminent personality like Swami Vivekananda, Annie Besant, and Mahatma Gandhi, Swami Dayanand Saraswati also had interest in the social and political rights of women. Gandhiji thought that, women should labour under no legal disability. He said that equal treatment should be given to both boy and girl.
Indian woman are well-known in various fields of life as politicians, orators, lawyers, doctors, administrators and diplomats. They are not only trusted with work of responsibility but also they do in their duties honestly and sincerely. In modern time women are actively participating in every field of life. Women exercise their right to vote, contest for Parliament and Assembly, seek appointment in public office and compete in other spheres of life with men. This demonstrates that women in India has got more liberty and equality as compared to earlier period. They have learned more liberty to contribute in the affairs of the country. They have been given impartiality with men in making their future and sharing responsibilities for themselves, their family and their country.
It is a truth that women are intelligent, devoted and efficient in work. In various fields, they are now competing successfully with men. There are many women working in the Central Secretariat. They are striving very hard to gain highest efficiency and perfection in the administrative work. Their honesty of character is probably better than men. Generally it was found that women are less vulnerable to corruption in form of bribery and favouritism. As a matter of fact, they are progressively monopolising the jobs of receptionists and air-hostesses. Another job in which Indian women are doing so well is that of teachers. Women's contributions in politics and social services have also been significant. Lively example of Indira Gandhi who excelled so brilliantly and ecstatically in the expanse of India's politics. She ruled this country for more than a decade and took India winning out of Pakistan-war which resulted in the historic creation of a new country, Bangladesh. In the field of social service, Indian women have also done outstanding works. They have not only served the cause of the suffering humanity but have also brought highest successes for the country, for example, Mother Teressa who sacrificed whole life for welfare of society. She brought the Nobel Prize for India by her selfless services to the poor, destitute and suffering people of our country in particular and the deprived and handicapped people of the world in general.
It is well understood that the progress of a nation depends upon the care and skill with which mothers give their children. The first and primary duty of Indian women should, therefore, be to bring forth noble generations of patriots, warriors, scholars and statesmen. Since child's education begins even in the womb and the impressions are formed in the mind of a child while in mothers arms in which women play vital role (Tripathi, 1999).
There is no refuting of the fact that the role of women in India is significant and they contribute in success of nation. Though they have to struggle against many handicaps and social evils in the male subjugated society. The Hindu Code Bill has given the daughter and the son equal share of the property. The Marriage Act no longer regards woman as the property of man. Marriage is now considered to be a personal matter and if a partner is disappointed she or he has the right of divorce. In order to prove themselves equal to the self-esteem and status given to them in the Indian Constitution they have to shake off the restraints of slavery and fallacies. They should help the government and the society in eliminating the sins of dowry.

Women's organization in India

Women's Organisations emerged in India as a result of the spread of education and the establishment of the notion of the new woman. There was an improved level of communication among women which made them aware of the different problems that they faced and their rights and accountabilities in society. This awareness led to the upsurge of women's organisations that fought for and signified women's causes.
Pre-Independence:
An exclusive feature of the Indian women's crusade is the fact that early efforts at women's liberation were set in motion by men. Social reformers such as Raja Ram Mohan Roy, Maharishi Karve and Swami Dayanand Saraswati challenged the conventional subservience of women, stimulated widow remarriage and supported female education and impartiality in matters of religion, among other issues. Mahila mandals organised by Hindu reformist organisations such as the Arya Samaj and Brahmo Samaj encouraged women to go out of the boundaries of their homes and interact with other members of society. Pandita Ramabai, who was considered as one of the innovators of the feminist movement, with the help of Justice Ranade established the Arya Mahila Samaj in 1882. She envisioned creating a support network for newly educated women through weekly lectures and lessons at homes, where women could learn and gain confidence through interactions.
Women's auxiliaries of general reform associations also served as a ground for women to deliberate social issues, express opinions and share experiences. The Bharata Mahila Parishad of the National Social Conference was the most protruding among such opportunities. Though the National Social Conference was formed at the third meeting of the Indian National Congress in 1887, the Mahila Parishad was launched only in 1905.
These initiatives greatly influenced the social status of women. Early attempts at encouraging women to converse outside their families and local committees thus, stemmed from the broader social reform movement and efforts to upgrade the conditions of women.
But a major inadequacy of the movement at this juncture was that it was essentially exclusive in character. The reforms were planned for restricted upper caste women and did not take up the cause of the huge masses of poor and working class women. Also, male‐guided organisations still perceived the household as the woman's first priority and did not make efforts to employ education as an instrument to improve their contribution in society.
In the beginning of nineteenth century, there was concerted efforts towards education of women. Schools and educational institutions promoting female public education mushroomed across the country.
The pre‐Independence period saw women's issues related to the nationalist agenda at various junctures. In this period, major enhancement of women was in terms of political participation of women, calling for a redefinition of conventional gender roles. Women began openly demonstrating their opposition to foreign control by supporting civil disobedience actions and other forms of protest against the British. Opportunities to organise and participate in agitations gave women the much‐needed confidence and a chance to develop their leadership skills. Cutting across communal and religious barriers, women associated themselves with larger problems of society and opposed sectarian issues such as communal electorates. Political awareness among women grew, owing to a general understanding that women's issues could not be separated from the political environment of the country. During this period, the initial women's organisations formed within the historical background of the social reform movement and the nationalist movement were as follows.
  1. The Women's India Association (WIA).
  2. National Council of Women in India (NCWI).
  3. The All India Women's Conference (AIWC) in 1917, 1925 and 1927 correspondingly.
Each of these organisations emphasised the importance of education in women's progress.
The WIA, created by Margaret Cousins in Madras, worked widely for the social and educational emancipation of women. Associated with the Theosophical Society, it encouraged non‐sectarian religious activity and did creditable work in promoting literacy, setting up shelters for widows and providing relief for disaster victims.
Women in Mumbai, Chennai and Kolkata through networks developed during World War I work, allied their associations together and created the NCWI in 1925. A national branch of the International Council of Women, its most prominent member was Mehribai Tata, who aggressively campaigned against inert charity and advised men to support female education.
The most important of the women's organisations of the time was the All India Women's Conference. Though its initial efforts were directed towards improving female education, its scope later extended to include a host of women's issues such as women's franchise, inheritance rights.
Period of Post-Independence:
The Constitution of India enlisted in 1950 which permitted equal rights to men and women. Rights such as the right to vote, right to education, right to entry into public service and political offices brought in satisfaction among women's groups. In this period, there was limited activity in the area of women's rights. Many women's organizations such as National Federation of Indian Women (1954) the Samajwadi Mahila Sabha (1559) were formed to work for supporting the cause of Indian women. Since the country was facing a social, political crisis after the British rule, many demands of the women activists were not supported by the Government. But during this period from 1945, the Indian women got an opportunity to participate in confrontational politics.
In post-independent India, the women's crusade was divided, as the common opponent, foreign rule, was no longer there. Some of the women leaders formally joined the Indian National Congress and took powerful position as Ministers, Governors and Ambassadors. Free India's Constitution gave universal adult franchise and by the mid-fifties India had fairly liberal laws concerning women. Most of the demands of the women's movement had been met and there seemed few issues left to organize around. Women's organizations now observed that there was an issue of implementation and consequently there was a pause in the women's movement.
Women displeased with the status quo joined struggles for the rural poor and industrial working class such as the Tebhaga movement in Bengal, the Telangana movement in Andhra Pradesh or the Naxalite movement. Shahada, which acquired its name from the area in which it occurred, in Dhulia district in Maharashtra, was a tribal landless labourers' movement against landlords. Women actively participated and led demonstrations, developed and yelled militant slogans and mobilized the masses. As women's belligerency developed, gender based issues were raised.
For the meantime in Ahmedabad the first attempt at a women's trade union was made with the establishment of the Self Employed Women's Association (SEWA) at the initiative of Ela Bhat in 1972. Major objective was to improve the condition of poor women who worked in the unorganized sector by providing training, technical aids and collective bargaining. Based on Gandhian ideals, SEWA has been a remarkable success.
The Nav Nirman movement, initially a student's movement in Gujarat against rising prices, black marketing and dishonesty launched in 1974 was soon joined by huge number of middle class women. Their method of protest reached from mass hunger strike, mock funerals and prabhat pheris.
The 1970s and 1980s observed the development of numerous women's groups that took up issues such as dowry deaths, bride burning, rape, and sati and focused on violence against women. They stressed the sexual coercion of women in a way previous reform or feminist groups had never done. They questioned the patriarchal assumptions underlying women's role in the family and society based on the biological sex differences implying a "natural" separation of human activities by gender differentials, the public political sphere being the male domain and the private familial sphere as that of the female which eventually translates into a supremacy of male over female. Some of the earliest self-governing women's groups were the Progressive Organization of Women (POW, Hyderabad), the Forum Against Rape (now redefined as Forum Against Oppression of Women), Stree Sangharsh and Samata (Delhi). Among the first campaigns that women's groups took up was the struggle against rape in 1980.
The modified law was passed in 1983 after heated debate with women's groups. Since then, women's groups have lobbied again to have the law further changed to make it more severe and have also fought for an implementation machinery to be set up without which the law is less effective than it was intended to be. The POW in Hyderabad planned new and fresh remonstrations against dowry. In the late 1970s, Delhi became the focus of the movement against dowry and the violence imposed on women in the marital home. Groups which took up the campaign included 'Stree Sangharsh' and 'Mahila Dakshita Samiti'. Later, a joint front called the 'Dahej Virodhi Chetna Mandal' (organization for creating consciousness against dowry) was made under which a large number of organizations worked.
In 1975, the Lal Nishar Party structured a joint women's conference which was well attended by women in Pune in Maharashtra. Similarly the communist party in India in 1975 organized a National Seminar which was attended by women in Maharashtra. The famous women's organisations which were established during this time are the Stree Mukhti Sangkatana, the Stree Sangharsh and Mahila Dakshata in Delhi. Vimochana in Chennai, Baijja in Maharashtra, Pennurumai in Chennai. The Feminist Network in English and Manushi in Hindi were some of the first women's newsletters and magazines to appear. The issues that they raise are rape, wife-battering, divorce, maintenance and child custody along with legislative reforms. This progressive outlook is indeed a by-product of the changing economic, social and political climate in the country. Therefore, the women's movement in India after Independence struggle not only struggled for liberation but also averred the need for creating a non-class socialist society where women can be completely free from apprehension and violence. The reverberations of changes, recurrent and sporadic at the beginning, began to be heard rather loudly from the middle of the 20th century.
Some women organizations such as the Banga Mahila Samaj, and the Ladies Theosophical Society functioned at local levels to promote contemporary ideas for women. These organizations deal with issues like women's education, abolition of social evils like purdah and Child marriage, Hindu law reform, moral and material progress of women, equality of rights and opportunities. It can be believed that, the Indian women's movement worked for two goals.

  1. Uplift of women.
  2. Equal rights for both men and women.
All the major political parties, the Congress, BJP, CPI, CPI (M) have their women's wings. The new women's groups declare themselves to be feminist. They are dispersed with no central organization but they have built informal networks among themselves. Their political commitment is more leftist than liberal. Currently there are many women organizations of India:

  1. All India Federation of Women Lawyers
  2. All India Women's Conference
  3. Appan Samachar
  4. Association of Theologically Trained Women of India
  5. Bharatiya Grameen Mahila Sangh
  6. Bharatiya Mahila Bank
  7. Confederation of Women Entrepreneurs
  8. Durga Vahini
  9. Friends of Women's World Banking
  10. Krantikari Adivasi Mahila Sangathan
National alliance of women: The National Alliance of Women (NAWO) is a national web of women. It is affiliation or membership is open to all liberal minded women's groups and institutions, non-governmental organizations, women workers, women's unions, individuals and others who share the principles, objectives and values of NAWO, as defined in the NAWO vision. Major objective of this organization are:

  1. Strengthening and building new initiatives, networks, forums etc., for protecting women's rights
  2. Monitoring the Government of India's commitments, implementing the Platform for Action with special focus on the eight point agenda discussed at the Conference of Commitment, CEDAW, the Human Rights and other United Nations Convention.
  3. Advocacy, lobbying and campaigning on women related issues.
  4. Information Dissemination and Documentation.
  5. Solidarity and linkages with other regional and global forums.
Another women organization in India is Swadhina (Self-esteemed Women) which was formed in 1986. It is principally a civil society organization focused on Empowerment of women and Child Development based on Sustainable Development and Right Lively hood. At Swadhina, it is believed that positive social change has a direct effect on the lives of women and that change is possible only through an equal and spontaneous participation of Women. Organization members are active in five states across the country in remote tribal districts of Singbhums in Jharkhand, Purulia and West Midnapur in West Bengal, Kanya Kumari in Tamil Nadu, Mayurbhanj in Orissa and East Champaran in Bihar.
Major projects of this organization are as follows:
  1. Women's Empowerment Through:
    • Promoting Grass-Root level Women's Organization
    • Fostering Functional Literacy, Education & Social Awareness generation
    • Augmenting Participation of Women in Local Governance
    • Encouraging Women's Income Generation & economic capacity building
    • Strengthening Women's Participation in Agriculture & Food Security support
    • Upholding Non-Violence & Social Empowerment
    • Improving Family Health & Nutrition
  2. Child Development Through:
    • Supporting Child Education
    • Promoting Sports & Games
    • Advancing Environment & Eco-logical awareness
All India Democratic Women's Association is also dominant woman organization which is an independent left oriented women's organisation committed to achieving democracy, equality and women's emancipation. AIDWA members are from all strata in society, regardless of class, caste and community. It has an organizational presence in 22 states in India.
AIDWA was created in 1981 as a national level mass organisation of women. AIDWA believes the liberation of women in India requires fundamental systemic change. It upholds secular values and challenges and resists cultural practices demeaning to women.
To summarize, women from earlier time has significant role in shaping of civilization. Historical data indicated that though the struggle for women's rights is long and hard, but currently, status of women is enhanced and society recognized their importance. It was observed that after Independence, the Indian women gained considerable importance within their country in social and political spheres. The women's movement has a long way to go in its struggle for bringing about new values, a new ethics and a new democratic affiliation. The objectives were to get equality based on gender, job opportunities, improving the existing laws which gave women only partial justice, and creating a society which did not dominate women intellectually, physically and emotionally. Even though the efforts made by women activists and concerned organization were slow in getting a real break-through, despite the conservative outlook of their counterparts, they thrived in creating a focussed awareness among middle-class and upper middle-class women at large. Currently, Indian woman is working throughout the country at high post and virtually in all professions at different positions. She is not only visible as the top politician as seen above in politics. Even as managers in industrial firms, director of nationwide operating banks, top bureaucrats, active members of micro-credit groups or as independent fashion designers. Government is going to help women in every sphere of life in society. Numerous programs are implement to empower women in India (Tripathi, 1999).

Courtsey : http://www.civilserviceindia.com
http://www.civilserviceindia.com/subject/General-Studies/notes/role-of-women-and-womens-organization.html